कहानी :
कोहरा
- लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)
सर्द ठंडी हवा। सुबह कोहरे से ढक चुकी थी। प्रदीप अपने घर के गलियारे से प्रकृति का यह खूबसूरत नज़ारा देख खुश हो गया। शहर के सिमेंट के जंगलों से दूर उनका यह घर अभी तक प्रकृति से जुड़ा था। रास्ते पर आवाजाही भी थम सी गई थी। पेड़ों के उपर कोहरे की परत चढ़ गई थी। अपने मोबाइल के कैमरे से वह उस कोहरे की तस्वीरें खींचने लगा।
आज उसके दिन की शुरूआत बहुत ही अच्छी हो गई थी। उसको अपना बचपन याद आ रहा था। ठंड के ऐसे मौसम में दौड़ लगाना। ओस की बूंदों से खेलना। अहाते में छोटी - छोटी लकडियों से आग जलाकर हाथों को सेंकना। अब धीरे धीरे बचपन जैसे अतीत में बैठा एक दोस्त लगने लगा था। सकून देते बचपन के वह पल यादों मे महफूज़ जो थे।
तभी घर की रसोई से बरतनों की आवाजें आने लगी थी। वह जल्दी से नहाकर चाय – नाश्ते के लिए अपने कमरे से बाहर निकला।
टेबल पर मां- बाबूजी बैठे थे। ठंडी हवाओं से बचने के लिए सबने गर्म कपड़ों से अपने आप को लपेट लिया था।मां उसको देखकर कहने लगी, “इतनी ठंडी हवा है। तू बिना स्वेटर पहने आ गया”
वह हंसने लगा, “आज बाहर कितना खूबसूरत कोहरा छाया था। बेहद अच्छा मौसम है। मुझे तो अच्छा लग रहा है। अभी तो स्वेटर की मुझे कोई जरूरत महसूस नहीं हुई है”
मां के स्वर में चिंता थी, “ऐसा मत कर। अब बाहर जाते समय स्वेटर पहनकर जाना”
बाबूजी हंस पड़े, “वह कोई स्कूल जाता बच्चा नहीं है। थोड़ा जिंदगी को समझने दीजिए”
वह हंसते हुए मां के सिर पर हाथ फेरता हुआ बोला, “आप दोनों की दुवा मेरे साथ है। मैं अब काम पर जाने के लिए तैयार होता हूँ”
वह अपने दफ़्तर जाने की तैयारी करने लगा।
बाबूजी उसके पास आकर बोले, “आज शाम मुझे किताबघर जाना है। मेरे एक मित्र से वहां मिलना है। तुम मेरे साथ चलोगे”
प्रदीप सर हिलाते हुए बोला, “जरूर, मुझे भी वहां गए हुए काफी दिन हो गए हैं”
मां ने प्रदीप का टिफिन टेबल पर रख दिया था। रोजाना की तरह वह अपने टिफिन को बैग में रखकर मोटरसाइकिल से दफ़्तर के लिए रवाना हो गया।
बाबूजी शाम के इंतजार में डूब गए। मां घरेलू कामों में व्यस्त हो गई। अवकाश पाने के बाद हरदेव जी किताबों से, सामाजिक सदभाव रखनेवाली संस्थाओं से जुड़ गए थे। कभी कभार उनके साथ प्रमिला जी भी जाती थी। वैसे घरेलू व्यस्तताओं ने प्रमिला जी को अजीब सा बांध के रखा था। यह बात हरदेव जी भी समझते थे। यह समझदारी ही उनके जीवन की नींव थी।
शाम को शहर में जाने के लिए प्रदीप ने कैब बुलवा लिया। वह बाबूजी को साथ लेकर कैब से शहर में जाने के लिए निकला। बाबूजी शहर मे बढ़ती भीड़, धुआं फेंकती गाडिय़ां, अजीब कर्कश हार्न की आवाज़ों से परेशान हो जाते थे। सही समय पर मुकम्मल जगह पहुंचना अब इस शहर में किसी के बस मे नही रहा था। शहर बढ़ता ही जा रहा था। शहर के आसपास के छोटे गांव तो देखते-देखते शहर के पेट में कब के समां गए थे।
किताबघर को एक संस्था चलाती थी। वहां शुरू मे एक छोटा सभागार भी था। वही कोने में यह किताबों की छोटी दुकान भी थी। इस दुकान से किताबों की बिक्री कम होती थी। लेकिन लोगों को वहाँ बैठकर पढ़ने की इज़ाज़त थी।काफी लोग मुफ्त में वहां किताबें छोड़ जाते थे। बाबूजी इस किताबघर को अपने पढ़ाई के जमाने से पसंद करते थे।
बाबूजी जिनको मिलने आए थे, वह अभी तक पहुंच ही नहीं सके थे। प्रदीप किताबें देखने लगा। बाबूजी को किताबघर का नया रूप अच्छा लगा। किताबघर को उस संस्था ने आधुनिक रूप में ढालने का प्रयास किया था। लेकिन अब यहां पहले जैसा मुफ्त कुछ भी नहीं था। किताबों को वहां बैठकर पढ़ना है तो आपको बैठने के लिए पैसे देना था। संस्था को अब टिके रहने के लिए पैसा चाहिए था। पहले चौकीदार भी नहीं था। अब आ गया है। सब आधुनिक बदलाव सचमुच पैसे के बिना असंभव ही थे।
तभी एक व्यक्ति हाथों में किताबों से भरा थैला लेकर अंदर आया। उसको बहुत जल्दी थी। उसने रजिस्टर पर किताबें भेजनेवाले का नाम और मोबाइल नंबर लिख दिया और चला गया।
बाबूजी और प्रदीप उस खुले हुए किताबों के थैले को देखने लगें। वैसे किताबें अच्छी हालत में थीं। शेक्सपियर के चित्र के आवरण में नाटक, कुछ हिंदी किताबें थीं। बाबूजी को यह देखकर अच्छा लगा कि लोग अभी भी यहां मुफ़्त किताबें भेज रहे हैं। लेकिन किताबघर अब बदल गया था।
प्रदीप बाबूजी का चेहरा देख समझ गया था कि, वह गंभीर हो गए हैं। वह उनको बोला, “बाबूजी क्या बात है”
बाबूजी उसको बोले, “ चलो सामने काफी पीते हैं”
संस्था का अपना एक रेस्तरां भी था। दोनों वहां चले गए। काफी पीते हुए बाबूजी प्रदीप को कहने लगें, “हम गांव से यहां यूनिवर्सिटी में पढ़ने आए थे। यह किताबघर सचमुच घर लगता था। यहाँ आंगन था। कुछ पेड़ थे। हम जमीन पर बैठकर किताबें पढ़ते थे। बहस करते थे। इस सभागार में नाटक मंचित होते थे। रंगकर्मियों को देखते थे। सब मुफ़्त था। हमने कभी भी उस जमाने में किताबें खरीदी नहीं। हम कविता संग्रह अपनी कलम से लिखकर कापियों मे उतार लेते थे। नाटकों के अंश भी लिखकर रखते थे। उस जमाने में न फोटोकॉपी बनती थीं, न मोबाइल था।“
प्रदीप हंसने लगा। “बाबूजी अब तो हस्ताक्षर करने की भी जरूरत नहीं है।आप देख ही रहे हो विज्ञान से कितना बदलाव आ गया है”
बाबूजी ने रेस्तरां में नजर घुमाई मित्र यहां भी नहीं था। न उसका कोई संदेश था। शायद वह पहुंच ही नहीं सका था। इसलिए अब यहां रूकने से कुछ नहीं होगा समझकर वह प्रदीप को बोले, “ चलो निकलते हैं। अब सब्जी मंडी भी जाना चाहिए”
फूटपाथ पर पाव-भाजी,भेल,पकौड़े, जूस जैसी अन्य खाने - पीने की खुली गाडिय़ां आ चुकी थी। उनके आसपास ग्राहकों का आना शुरू हो गया था।
हरदेव जी मन ही मन खीझ उठे थे।“ प्रदीप, हम उस जमाने में जब यहां से निकलते थे तो साईकिलों पर मूंगफली, फलों को बेचनेवाले घूमते रहते थे। स्टेशनरी की छोटी दुकानें, मिठाई की दुकानें थी। लेकिन आज के जैसा हुजूम उमड़ कर नहीं आता था। शायद रास्ते पर इस तरह से खाना उचित नहीं समझा जाता होगा, ऐसा ही लगता है।लेकिन अब तो दूषित हवा में बना खाना, जो एक मौज का माहौल बन गया है”
प्रदीप बाबूजी को समझाने लगा, “ बाबूजी, रोजगार के अवसर शहरों मे आकर ही लोगों ने अर्से से खोजें हैं। इस शहर में सस्ता खाना, कम पैसे मे रहना, ऐसे संघर्षों मे सब बेबस हो जाते हैं”
हरदेव जी का चेहरा प्रदीप की बातें सुनकर उद्विग्नता से भर आया था, “ हर दुकान के सामने प्लास्टिक थैलियों से भरी खाने- पीने की चीजें, उसपर रंगबिरंगे चमकीले प्लास्टिक बल्बों से सजी सड़कें, रात मे बढ़ती यह भीड़, गाडिय़ों के कर्कश हार्न,चायनीज फूड की खुली दुकानों का मंजर” हरदेव जी हताशा से बोल रहे थे।
प्रदीप को भी सचमुच घुटन हो रही थी। उसने कैब बुक कर दी और वह कहने लगा, “बाबूजी, चलो घर चलते हैं। अब सब्जी मंडी भी नहीं जा सकेंगे”
“ठीक है। कितना अजीब सा मानवनिर्मित यह कोहरा है। यह प्रदूषण हजारों दुर्घटनाओं को जन्म दे रहा है। रोजगार तो तब मिलेगा जब हमारी दुनिया बची रहेंगी”
प्रदीप बाबूजी की चिंता से प्रभावित हो गया था। वह कैब मे बैठते हुए बुदबुदाया, “सचमुच सडकों पर, हर मोड़ पर फेंका कचरों का फैलता बदबूदार गंध, उफ! आप सच कह रहे है।यह मानवनिर्मित प्रदूषण का कोहरा थमने का नाम ही नहीं ले रहा है।”
भीड़ से धीमी गति मे कार निकल ही रही थी। तभी हरदेव जी का मोबाइल बजने लगा, “ माफ़ करना। मैं शाम की भीड़ में फंस गया था। अब वहां आ नहीं सकता। अब तुम ही मेरे गांव आ जाना। मुझे सुबह वापस जाना है।फिर मिलेंगे” बोलते - बोलते मित्र का फोन कट गया था। हरदेव जी ने अफसोस भरी आह भरी।
प्रदीप सीट पर आंखें मूंद कर बैठ गया। कैब भीड़ से छुटकारा पाकर खुले रास्ते पर दौडऩे लगी। कैब ड्राइवर ने पूछा, “गीत लगाता हूँ, सर आपको कोई ऐतराज तो नहीं?”
“हां, लेकिन धीमी आवाज में” प्रदीप ने जवाब दिया।
अब गीत बज उठा था। पहले धीमा शोर- संगीत फिर कुछ शब्द “क्रेज़ी किया रे…”
प्रदीप बाबूजी की तरफ़ देखने लगा। वह गुमसुम से हो गए थे। मित्र को ना मिल पाने के गम से या बदलते पर्यावरण से..।
- लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)
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