जीवित पितरों का अपमान, मरने पर पिंडदान, क्या अनुचित प्रथा नहीं ?
जब दुनिया में माता पिता जीवित होते है तब उनकी संताने उन्हें खून के आंसू रुलाती हुई रोज अपमान कर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक यंत्रणायें देने में अग्रणी होती है किन्तु उनकी जैसे ही इन माता पिताओं का स्वर्गवास हो जाए तो पितृ-पक्ष में उनकी अंतरात्मा जाग उठती है और वे पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिंडदान करने के सारे आडम्बर कर अपने को योग्य संतान साबित करने सनातन धर्म की आड़ ले लेता है, यह प्रथा क्या उचित है या अनुचित यह यक्ष प्रश्न मेरे मन मस्तिष्क में हिलौरे मारने लगा जब एक बुजुर्ग पिता के तीन संताने होने के बाद कोई भी पुत्र सक्षम होते हुए अपनी पत्नियों का गुलाम होने से अपने बूढ़े पिता के मदद के लिए आगे नहीं आये और जैसे ही उन्होंने उनकी मृत्यु की खबर सुनी दुनिया के सामना दिखावा करने के लिए फूलों के हिडोले में अर्थी सजाकर बैंडवाजे के साथ अंतिम क्रिया में सारे आडम्बर को विधि विधान से पूरा करते दिखे मानो उनकी इस अंतिम विदाई पर उनके पिता की जीवात्मा प्रसन्न मुद्रा में चंद्रलोक की तरफ बढ़ गई है और संतानों के अंतिम क्रियाक्रम के बाद के सारे दिखावी उपद्रव की बदौलत उनके पिता पितृलोक पहुचं गए है।
जिस पिता ने पूरी उम्र खून पसीना बहाकर एक एक पैसा जोड़कर अपने तीनों बेटों-बहुओं के लिए एक विशालकाय 7 कमरों और एक हाल अपने मंझले पुत्र के साथ गुजारते हुए छोटे पुत्र की धूमधाम से पडौस में शादी की, कित्नु बहु के आते ही षड्यंत्र के तहत बहु के कहने पर छोटे पुत्र ने दो बार आत्महत्या का नाटक कर मंझले बेटा बहु और उसके तीन बच्चों के घर निकाला करवा कर पुरे मकान पर कब्ज़ा कर पिता की पेंशन भी हथिया ली, चूँकि छोटा बेटा वकील की प्रेक्टिस न कर अपने पिता के सपनों को पूरा नहीं कर सका और उसकी डिग्री कौर्ट में प्रेक्टिस करने की बजाय किराने की दुकान खोलकर होशिहारी दिखाने में सफल रहा और उसकी लालची पत्नी ने एक कमरा बनाकर घर के बाहर माता पिता को कर उन्हें तकलीफ देना शुरू किया और समय पर उन्हें दवाओं से वंचित रखने के बाद जब कभी एक दो दिन के लिए बाहर जाते घर में ताला लगाकर माता पिता को भूखा छोड़ जाते । पिता के मरने के बाद दोनों बेटों ने अपनी माँ को पराया कर मंझले बेटे के भरोसे छोड़ दिया। बेईमानी में छोटा बेटा अपने बच्चों को शिक्षा और संस्कार भी नहीं दे सका, अब उसकी गरदन हमेशा उसके बेटों के हाथों में है किन्तु दुनिया के सामने वह अपनी अकड को तो गब्बर शेर की तरह बनाये हुए है परन्तु घर पर पत्नी के सामने भीगी बिल्ली ही रहा है। बड़े बेटे में संस्कार है, परन्तु पत्नी के सामने उनके संस्कार भी हाथी के दांत देखने के और खाने के और साबित होते है। पत्नी ने सारे जीवन अपने मायके से सम्बन्ध रखा और अपने ससुराल पक्ष से दुश्मनी रखी, इसी कारण इस बुजुर्ग पिता के पास दस पंद्रह साल तक न तो बेटे ने पुत्र धर्म निभाया और न ही बहु ने अपने ससुर की सेवा ही की। बड़े बेटे ने देखते देखते शहर में एक विशाल भवन खड़ा कर लिए लेकिन भूमि पूजन से मकान के उद्घाटन में अपने माता पिता को अपने घर एक बार भी लेकर नही गए जिससे पिता मकान की ख़ुशी और बेटे की उपेक्षा से दुखी रहे। तीनों बेटों को एकत्र कर पिता ने मझले को २२ साल बाद घर बुलाकर मकान बनाकर रहने को राजी किया किन्तु पिता के सामने तय शर्तों को भूलकर बेटों ने पिता के आत्मा को सुख पहुचाने की बजाय दुःख ही दिया है। बड़ा बेटा नियम से श्राद्ध कर्म में लग गया ताकि उनके मृतक पिता की आत्मा जहा जिस लोक में हो उनके श्राद्ध कर्म के पुण्यों की शक्ति से वे प्रसन्न हो सके।
जब से इन्सान इस धरती पार आया है तब से पीढ़ीदर पीढ़ी उसकी पहचान उसके जन्मदाता माता और पिता से हुई है और जिस समाज, कुल,गौत्र में उसका जन्म होता है उससे जन्म संस्कार से ही उसपर माता पिता का ऋण चढ़ जाता है। इन्सान की अनगिनत पीढ़ियों जीवन के संस्कार, मूल्य, परंपराएं के साथ देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से ऋणी रही है । पितृ ऋण से मुक्ति के प्रयास का अवसर पिता की मृत्यु के उपरांत आने वाले पितृ पक्ष में श्राद्ध से संभव है। आजकल के बेटे श्राद्ध का अर्थ केवल विधि-विधान श्राद्ध या पिंडदान भा करना ही मानते है जबकि श्राद्ध से पितरों को याद करना, उनकी सद् इच्छाओं को आगे बढ़ाना, उनके अच्छे अधूरे कार्यों को पूरा करना, परिवार को जोड़कर रखना और संस्कारों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना, घर परिवार में बिखराव मिटाकर उन्हें जोड़े रखना भी श्राद्ध है।
हम तो यही कहेंगे कि जो व्यक्ति अपने जीवित पिता-माता आदि की सेवा नहीं करते, उलटा उनको दुःख पहुँचाते हैं, या उनका अपमान करते हैं, बाद में उनका पिंडदान और श्राद्ध करना तर्पण करना- जल, तिल और कुश से पितरों को अर्घ्य अर्पित करना कोरा ढोंग है और उसका कोई परिणाम नहीं; क्योंकि अगर हमारे श्राद्ध का फल पितरों तक सूक्ष्म रूप से पहुँचता भी है, तो वह तभी संभव है, जब हम सच्ची भावना और एकाग्र चित्त से उस कार्य को करें। पर जो लोग जन्म भर अपने पिता-माता को हर तरह से कष्ट पहुँचाते रहे, उनको भला-बुरा कहते रहे, वे फिर किस प्रकार श्रद्धा और हार्दिक भावना से श्राद्ध आदि कर्म कर सकते हैं ? मेरे ही नहीं अपितु आप सभी के समक्ष आपके घर पड़ोस-परिवार में एक नही लाखों उदाहरण मिल जायेंगे जहा जिन्दा रहते जिन माता पिताओं के बच्चों ने भोजन दवा आदि सेवाओं से वंचित रखा वे अब दुनिया के सामने अपने धर्म कर्मा का झंडा ऊँचा करने के लिए पिंडदान और श्राद्ध में लग गया है। जगह जगह हर शहर हर गाँव में श्राद्ध में पितरों के नाम पर धुंधकारी जैसे बेटे भी ब्राह्मण-भोजन करा रहे है और उन्हें विश्वास है की इसके पुण्य-फल से उनके पितरों का भोजन मिलेगा और वे संतुष्ट हो सकेंगे। धर्म-शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि जो मनुष्य श्राद्ध करता है, वह पितरों के आशीर्वाद से आयु, पुत्र, यश, बल, वैभव, सुख और धन-धान्य को प्राप्त होता है, किन्तु धर्मसूत्र कपूतों के विषय में क्या कहता है जिनके दुष्कर्मों के कारण माता पिता त्रासदीपूर्ण मौत को गले लगते है। धर्म-प्राण हिंदू कहलाने वाले ये सारे सपूत-कपूत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष भर प्रतिदिन नियमपूर्वक स्नान करके गंगा, यमुना, कृष्णा, काबेरी, गोदावरी, नर्मदा आदि पवित्र नदियों में पितरों का तर्पण कर रहे हैं। जो दिन उनके पिता की मृत्यु का होता है, उस दिन ये अपने घर परिवार, कुटुंब और नाते रिश्तेदारों को भोजन कराते है वही अपनी शक्ति के अनुसार दान करके ब्राह्मण-भोजन कराने में जुटे हैं।
बाबजूद इस प्रकार के बेटे और संताने भी है जो माता पिता की परम भक्त होती है और उनकी सेवा में किसी प्रकार की कमी नही रखकर उनका जीवन अंतिम सांसों तक स्वर्गिक बनाये रखते है वे ही पुरे मनोयोग से श्राद्ध-कर्म पिंडदान में लगे है और अपने तन-बदन की सुधि भूल जाते थे। उन्हें बाल बनवाने, तेल लगाने, पान खाने आदि का भी अवकाश न मिलता है। उसी बात के चिह्न स्वरूप आज भी अनेक हिंदू, चाहे वे श्राद्ध करने वाले न भी हों, इन कार्यों से पृथक् रहना धर्मानुकूल मानते हैं। वैसे जिन लोगों के पिता स्वर्गवासी हो गये हैं, वे अमावस्या तक और जिनकी माता स्वर्गवासी हो गई हैं, वे मातृ-नवमी तक न तो बाल बनवाते हैं और न तेल लगाते हैं। पितरों का पिंडदान करने का सबसे बड़ा स्थान गया माना जाता है और जनता में ऐसी मान्यता है कि गया में पितरों को पिंडदान कर देने पर फिर प्रति वर्ष पिंड देने की आवश्यकता नहीं रहती।
यह भी कहते हैं कि महाराज रामचंद्रजी ने गया आकर फल्गू नदी के किनारे अपने मृत पिता महाराज दशरथ का पिंडदान किया था। वे संताने जो अपने जीवित माता-पिता की सेवा करना ही अपना परम धर्म नहीं मानते थे, वरन् उनके मरने पर भी उनका सेवा-सत्कार करना अपना पवित्र कर्तव्य समझते थे और इसके लिए 15 दिन का समय अलग कर दिया था। यह प्रथा कितनी पुरानी है इसका प्रमाण हिंदुस्तान के मुगल सम्राट शाहजहाँ के इस कथन से मिलता है जब उसे उसके लड़के औरंगजेब ने आगरा के किले में कैद कर रखा था, एक पत्र में औरंगजेब को लिखा था कि - "तुम से तो हिंदू लोग ही बहुत अच्छे हैं, जो मरने के बाद भी अपने पिता को जल और भोजन देते हैं। तू तो अपने जीवित पिता की भी दाना-पानी के बिना तरसा रहा है।" पितृपक्ष का महत्त्व इस बात में नहीं है कि हम श्राद्ध कर्म को कितनी धूम-धाम से मनाते हैं और कितने अधिक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वरन् उसका वास्तविक महत्त्व यह है कि हम अपने माता पिता, पितामह आदि गुरुजनों की जीवितावस्था में ही कितनी सेवा-सुश्रूषा, आज्ञा पालन करते हैं। चाहे अन्य लोग हमारी बात को ठीक न समझें, पर जीवित पितरों के अपमान और मृत पितरों को श्राद्ध और पिंडदान की इस दिखावटी प्रथा का समाज में विरोध होना चाहिए और जो व्यक्ति अपने आसपास इस प्रकार के प्रकरण देखकर उनके श्राद्ध और पिंडदान के भोज में शामिल होता है उसे इस प्रकार के बेटों के द्वारा दिए जाने वाले भोज –दान आदि का बहिष्कार कर मृतक के प्रति सम्मान बनाये रखना चाहिये।
- आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथधामकाली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाईल 9993376616
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