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निजी सुरक्षा गार्ड वर्दी में दर्द - विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल


 निजी सुरक्षा गार्ड वर्दी में दर्द

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल 

     भारत में निजी सुरक्षा का चेहरा वही गार्ड है जो कॉलोनी के फाटक पर खड़ा दिखता है और जिसकी ड्यूटी हमारे घर लौटने से पहले शुरू हो जाती है और हमारे सो जाने के बाद भी चलती रहती है। इस पेशे की कानूनी रूपरेखा केंद्र के गृह मंत्रालय के अधीन पीएसएआरए नामक कानून से तय होती है। इस कानून के तहत एजेंसी को लाइसेंस लेना पड़ता है और गार्ड को प्रशिक्षण देना अनिवार्य है। गृह मंत्रालय के मानक संचालन निर्देश में प्रशिक्षण की स्पष्ट अवधि दी गई है। नए गार्ड के लिए सौ घंटे कक्षा और साठ घंटे मैदानी प्रशिक्षण, कुल मिलाकर एक सौ साठ घंटे, जबकि सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए चालीस घंटे का संक्षिप्त पाठ्यक्रम मान्य किया गया है। प्रशिक्षण संस्था और पाठ्यक्रम की सूची सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध रहती है ताकि एजेंसियां मनमाने तरीके से प्रशिक्षण न दिखा सकें और प्रमाणपत्र पूरे देश में मान्य हों। यह व्यवस्था वर्दी ,  पहचान पत्र पहनने से लेकर शिष्टाचार, चौकीदारी कौशल, आपातकालीन प्रतिक्रिया और कानूनी जानकारी तक सब कुछ कवर करती है।

शैक्षणिक अर्हता की बात आए तो नियम मूलतः कार्यकुशलता और साक्षरता पर ज़ोर देते हैं। कुछ राज्यों के नियम बताते हैं कि गार्ड को अंग्रेजी वर्णमाला और अरबी अंकों को पढ़ने समझने में सक्षम होना चाहिए ताकि वह नाम पते और वाहन संख्या जैसे विवरण ठीक से दर्ज कर सके। कई कौशल परिषदों और राज्य कौशल विकास एजेंसियों के मॉडल पाठ्यक्रम गार्ड के लिए दसवीं उत्तीर्ण को न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता बताते हैं, जिससे भर्ती और प्रशिक्षण दोनों सुचारु होते हैं। इस तरह शैक्षणिक कसौटी और प्रशिक्षित व्यवहार का सम्मिलित मानक बनता है जो जनता के भरोसे को मजबूत करता है। 

देश में कितने गार्ड हैं, इसका आंकड़ा सरकारी जनगणना की तरह एक जगह नहीं मिलता, पर उद्योग के शीर्ष संगठन कैप्सी के अनुसार निजी सुरक्षा क्षेत्र दस मिलियन से अधिक लोगों को आजीविका देता है। दूसरी ओर सरकार के पीएसएआरए पोर्टल पर एजेंसियों के लाइसेंस का राज्यवार ब्योरा प्रतिदिन अद्यतन होता है। ताज़ा स्थिति के अनुसार पूरे देश में करीब अट्ठाईस हज़ार चार सौ से अधिक एजेंसियां सक्रिय लाइसेंस के साथ दर्ज हैं और कुल जारी लाइसेंस पचास हज़ार के आसपास हैं। मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भी सक्रिय एजेंसियों की संख्या उल्लेखनीय है और उनका पूरा रजिस्टर सार्वजनिक पोर्टल पर देखने को मिलता है। यह पारदर्शिता बताती है कि वैध एजेंसी कौन है, उसका लाइसेंस कब तक मान्य है और वह किन जिलों में संचालन करती है। 

आय के प्रश्न पर तस्वीर परतदार है क्योंकि न्यूनतम वेतन राज्य और क्षेत्र के अनुसार बदलते हैं और यह भी निर्भर करता है कि संस्थान केंद्र के अधिकारक्षेत्र में आता है या राज्य के। फिर भी एक भरोसेमंद मानक केंद्र सरकार के मुख्य श्रम आयुक्त कार्यालय द्वारा घड़ी दर घड़ी संशोधित किए जाने वाले न्यूनतम वेतन हैं। वर्तमान परिपत्र के अनुसार एक अप्रैल दो हजार पच्चीस से वॉच एंड वार्ड श्रेणी में बिना हथियार के काम करने वाले गार्ड के लिए क्षेत्र ए में प्रतिदिन नौ सौ इक्यासी, क्षेत्र बी में आठ सौ तिरानवे और क्षेत्र सी में सात सौ साठ रुपए का कुल वेतन मान्य है। हथियारधारी गार्ड के लिए यही दरें क्रमशः एक हजार पैंसठ, नौ सौ इक्यासी और आठ सौ तिरानवे हैं। इन दरों में महँगाई भत्ता समाहित है और शहरों की श्रेणीकरण सूची भी परिपत्र के साथ संलग्न रहती है। राज्यों के अपने न्यूनतम वेतन अलग हो सकते हैं, इसलिए स्थानीय अधिसूचना देखना आवश्यक है, पर यह केंद्रीय मानदंड एक उपयोगी संदर्भ दे देता है। 

लेकिन वास्तविक भुगतान की स्थिति बेहद चिंताजनक है।

ड्यूटी टाइम की हकीकत और कानून के बीच अक्सर फासला दिखता है। अधिकतर कॉलोनियों में बारह घंटे की शिफ्ट चलती है, जबकि दुकाने और वाणिज्यिक प्रतिष्ठान कानून के अनुसार रोज़ नौ घंटे और हफ्ते में अड़तालीस घंटे काम का सामान्य नियम रखते हैं, इससे अधिक पर ओवरटाइम देना अनिवार्य है और कार्य अवधि दिन में अधिकतम बारह घंटे तक सीमित किया गया है। यह ढांचा मध्यप्रदेश दुकाने एवं स्थापना अधिनियम जैसे राज्यों के कानूनों में साफ लिखा है और इसी से साप्ताहिक अवकाश तथा रात की पाली जैसी स्थितियों का नियमन होता है। सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से बीस या अधिक कर्मियों वाली संस्थाओं में भविष्य निधि लागू होती है और ईएसआई के तहत इक्कीस हजार रुपए मासिक वेतन सीमा तक के कर्मचारी चिकित्सा बीमा कवरेज में आते हैं। इन प्रावधानों से गार्ड का काम केवल चौकीदारी नहीं रहता, उसके श्रम अधिकार भी कानून में आते हैं। 

एजेंसी पक्ष की जिम्मेदारियां भी उतनी ही स्पष्ट हैं। पीएसएआरए लाइसेंस के बिना निजी सुरक्षा एजेंसी नहीं चल सकती। लाइसेंस लेने के लिए स्वामित्व विवरण, आपराधिक पृष्ठभूमि जांच, प्रशिक्षण व्यवस्था, यूनिफॉर्म और पहचान पत्र जैसे मुद्दों पर प्रमाण देना पड़ता है। एजेंसी को गार्ड की पुलिस सत्यापन कराना अनिवार्य है और प्रशिक्षित कर्मी ही तैनात करने होते हैं। प्रशिक्षण संस्थान भी सरकारी पोर्टल पर सूचीबद्ध होते हैं, जिससे नियोक्ता यह जांच सके कि प्रशिक्षण वैध संस्था से हुआ है। राज्यवार एजेंसियों के सक्रिय और निरस्त लाइसेंस खुले पोर्टल पर दर्ज होने से ग्राहक और समाज दोनों को यह पता चल जाता है कि किसकी सेवाएं लेना सुरक्षित है। 

इन तथ्यों के बीच एक मानवीय  आधार भी  है। वेतन का कागजी अंक बढ़ेगा तो जीवन की सुविधा बढ़ेगी, प्रशिक्षण बेहतर होगा तो जोखिम कम होंगे और लाइसेंसिंग सख्त रहेगी तो पेशे की विश्वसनीयता बढ़ेगी, पर गेट पर खड़े उस पहरुए के लिए सबसे पहला सहारा हमारे व्यवहार से आता है। कानून अपनी जगह है, परहमारी ओर से कुर्सी की एक साधारण व्यवस्था, बरसात में रेनकोट, सर्दी में ऊनी टोपी, ड्यूटी के बीच गरम चाय का निमंत्रण और गार्ड के टिफिन खाते वक्त  आचार या सब्जी का एक चम्मच, ऑफर करना ये सब ऐसे छोटे काम हैं, और कुछ नहीं तो दो मीठे बोल भी उस पेशे की गरिमा को बढ़ाते हैं, जिसके भरोसे हमारी रातें चैन से गुजरती हैं। और शायद यही वह बिंदु है जहां शोध और संवेदना एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, ताकि सुरक्षा केवल नियम पुस्तिका में न रहे, वह हमारे आचरण में भी दिखे।


 - विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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