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हिन्दी राष्ट्र की आत्मा है - आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार ,नर्मदापुरम


 हिन्दी राष्ट्र की आत्मा है 

         - आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार 

        महात्मा गांधी ने समूर्ण देश के भ्रमणकाल में ही समझ लिया था की हिंदी राष्ट्रीयता का प्रतीक है और गरीब से गरीब और अमीर से उच्च शिक्षित लोगों तक बोली जाती है इसलिए हिंदी राष्ट की आत्मा में बसी है। आजादी के 11 साल पहले ही महात्मा गांधी ने 1936 में राष्ट्र भाषा प्रचार समिति की स्थापना कर 22 प्रांतीय समितियां , 987 शिक्षा केन्द्र तथा 7629 परीक्षा केंद्र बनाकर हिंदी राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का मुख्यालय वर्धा में रखा ताकि हिंदी को राष्ट्र्भाषा का सम्मान मिल सके । डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, वल्लभ भाई पटेल , जमनालाल बजाज आदि इन सभी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अथक परिश्रम किया और ये सभी आजादी की लड़ाई में भारत वर्ष में अपनी बात कहने और जनता की बातें सुनने के लिए तत्कालीन लोगों के आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक उत्थान हेतु हिंदी को ही माध्यम बनाने को तत्पर थे।

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने जिम्मा महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, सी राजगोपालाचारी, सरदार पटेल और सुभाषचन्द्र बोस सरीखे गैर-हिंदी भाषी नेताओं ने उठाया था. ये सभी हिंदी भाषी प्रदेशों से न होते हुए भी हिंदी की ताकत से वाकिफ थे. सभी को विश्वास था की देश के अन्य प्रदेशों के नेता इन बड़े नेताओं को अपना आदर्श मानने से इनके विचारों का विरोध नहीं कर सकेगा बावजूद हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी वर्ष 1947 में भारत आजाद हुआ तब स्वतन्त्र भारत के संविधान निर्माण के समय हिन्दी को राष्ट्र भाषा घोषित करवाने की तैयारी शुरू हुई किन्तु आजादी के पूर्वजो हिंदी का प्रचार प्रसार कर महात्मा गांधी की बने राष्ट्र भाषा हिंदी समिति के करता धर्ता और आजादी के लिए सर्वस्व लुटाने वाले कांग्रेसी नेताओं की राजनीति को साँप सूँघ गया। परतन्त्रता-काल में हिंन्दी के हिमायती कांग्रेसी नेता राजनीति के चक्कर में फँस गए और राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर कर हिन्दी भाषा के साथ छल कर उसे राष्ट्भाषा के गौरव से वंचित कर राजभाषा पर राजी हुए। राजभाषा एक संवैधानिक शब्द है, जबकि राष्ट्रभाषा स्वाभाविक रूप से सृजित शब्द इस प्रकार राजभाषा प्रशासन की भाषा है तथा राष्ट्रभाषा जनता की भाषा. समस्त राष्ट्रीय तत्वों की अभिव्यक्ति राष्ट्रभाषा में होती है, जबकि केवल प्रशासनिक अभिव्यक्ति राजभाषा में होती है.

 फलतः संविधान के अनुच्छेद 343 में लिखा गया-  'संघ की सरकारी भाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी होगी और संघ के सरकारी प्रयोजनों के लिए भारतीय अंकों का अन्तरराष्ट्रीय रूप होगा', किन्तु अधिनियम के खंड (2) में लिखा गया 'इस संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा, जिसके लिए इसके लागू होने से तुरन्त पूर्व होता था।' अनुच्छेद की धारा (3) में व्यवस्था की गई- 'संसद् उक्त पन्द्रह वर्ष की कालावधि के पश्चात् विधि द्वारा (क) अंग्रेजी भाषा का (अथवा) अंकों के देवनागरी रूप का ऐसे प्रयोजन के लिए प्रयोग उपबन्धित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लिखित हों।   . राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर राजभाषा एक संवैधानिक शब्द है, जबकि राष्ट्रभाषा स्वाभाविक रूप से सृजित शब्द इस प्रकार राजभाषा प्रशासन की भाषा है तथा राष्ट्रभाषा जनता की भाषा. समस्त राष्ट्रीय तत्वों की अभिव्यक्ति राष्ट्रभाषा में होती है, जबकि केवल प्रशासनिक अभिव्यक्ति राजभाषा में होती है. इसके साथ ही अनुच्छेद (1) के अधीन संसद् की कार्यवाही हिन्दी अथवा अंग्रेजी में सम्पन्न होगी। 26 जनवरी, 1965 के पश्चात् संसद् की कार्यवाही केवल हिन्दी (और विशेष मामलों में मातृभाषा) में ही निस्पादित होगी, बशर्ते संसद् कानून बनाकर कोई अन्यथा व्यवस्था न करे। चाहिए तो यह था कि संविधान में हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा का सम्मान मिलता और जिन अंग्रेजों की दो सौ साल गुलामी सही उनकी भाषा अंग्रेजी को देशनिकाला देना चाहिए था किन्तु गुलामी विचारधारा के इन पिछलग्गू नेताओं ने अंग्रेजी भाषा के सहयोग की बात कर हिन्दी के पैरो में शब्दों के भ्रम की बेडिया डाल दी।

राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक है। हमारे साथ स्वतन्त्र होने वाले पाकिस्तान ने उर्दू को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया। तुर्की के जनप्रिय नेता कमाल पाशा ने स्वतंत्र होने के तत्काल पश्चात् वहाँ तुर्की को राष्ट्रभाषा बना दिया। इतना ही नहीं अपने नाम के साथ' पाशा' विदेशी शब्द हटाकर अपना नाम कमाल अतार्तुक कर दिया। हमारे पश्चात् स्वतन्त्र होने वाले अनेक राष्ट्रों ने अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा की घोषणा कर दी, किन्तु भारत के कर्णधार 'सबको खुश करने' की प्रणाली पर चलते हैं। सबको खुश करने का अर्थ सबको नाराज करना होता है। वही हुआ। राजभाषा अधिनियम 1963 के अन्तर्गत हिन्दी के साथ अंग्रेजी के प्रयोग को सदैव के लिए प्रयोगशील बना दिया गया। संसद् में भी हिन्दी के साथ अंग्रेजी के प्रयोग को अनुमति मिल गई और कहा गया कि जब तक भारत का एक भी राज्य हिन्दी का विरोध करेगा, हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ नहीं किया जाएगा। पंडित जवाहर लाला नेहरु चाहते तो महात्मा गांधी का सपना था की हिदी हिनुस्थान की राष्ट्रभाषा बने किन्तु वे हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने का साहस नही कर सके। 

 राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी सहित अनेक कवि, राष्ट्रीय लेखक, राष्ट्रीय झंडा फहराने वाले हिन्दी-लेखकों, हिन्दी-संस्थाओं के संचालकों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा न बनाये जाने का खुलकर विरोध ही नही किया बल्कि उन्हें सरकार से मिले मान सम्मान पुरुस्कारों को भी लौटा कर हिंदी के प्रति अपना प्रेम जीवित रखा।आज आश्चर्य होता है  हिन्दी हितैषियों को माँ-भारती को पददलित होते देखकर भी लज्जा न आई। हाँ, एकमात्र कांग्रेसी, माँ-भारती का सच्चा सपूत सेठ गोविन्ददास ही इस अग्नि परीक्षा में सफल हुआ। उसने डंके की चोट  पर अपना सीना तान कर राजभाषा अधिनियम 1963 के विरुद्ध मत दिया। वे संसद् में दहाड़ उठे, 'भले ही मुझे कांग्रेस छोड़नी पड़े, पर मैं आँखों देखा विष नहीं खा सकता।' लोकतन्त्र के महान् समर्थक पण्डित जवाहरलाल नेहरू द्वारा हिन्दी को सिंहासनारूढ़ करने की अन्तिम शर्त लोकतन्त्र का अनादर है, जनतन्त्र के आधारभूत नियमों के विरुद्ध है, प्रजातंत्र का गला घोंटना है। लोकतन्त्र बहुमत की बात करता है, सबके साक्ष्य की नहीं। न सारे प्रांत कभी हिन्दी को चाहेंगे, न हिन्दी सिंहासनारूढ़ होगी।' वस्तुतः वह शर्त अनन्तकाल तक अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखने का षड्यंत्र  का एक हिस्सा ही बनी है और आगे अनंतकाल तक बनी रहने सी इंकार नही किया जा सकता है।

         नेहरु सहित कांग्रेस नेताओं ने महत्मा गांधी की हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने वाली बात का सम्मान नही रखा, उलटे अंग्रेजों की फुट डालों शासन करों की तर्ज पर भाषा के प्रश्न पर उत्तर-दक्षिण की बात खड़ी करके भारतीय समाज को विघटित कर दिया गया। दक्षिण संस्कृत भाषा, विद्वत्ता और अनुसंधान का गढ़ रहा है। हिन्दू-संस्कृति और सभ्यता, वैदिक साहित्य और सूत्रों का अध्ययन और व्याख्या करने की क्षमता दक्षिण की बपौती रही है। दक्षिण के देवालय आज भी हिन्दू-संस्कृति की पताका फहरा रहे हैं। आज भी वेदों के पण्डित तथा संस्कृतविद्वान् उत्तर की अपेक्षा दक्षिण भारत में अधिक हैं। वही दक्षिण संस्कृत की पुत्री हिन्दी का विरोध करे, यह बात समझ से परे है। हाँ, राजनीति द्वारा आरोपित विष-वृक्ष फूट के फल तो लाएगा ही। हिन्दी कहने को राष्ट्रभाषा है, किन्तु प्रांतीय भाषाएँ भी उसके इस अधिकार की अधिकारिणी बना दी गई हैं। अंग्रेजी-साम्राज्य की गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी आज भी भारत पर राज्य करती है। राज्य कार्यों में उसका ही वर्चस्व है।

  - आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार 

श्रीजगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाईल -9993376616

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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