काव्य :
हिंदी दिवस पर दोहे
कहलातीं संस्कृत सुता, जन -जन पर है राज |
भगिनी को भी ले चली,कितना सुन्दर काज ||
बैर किसी से है नही, रखती है समभाव |
सदा संग हिल मिल चली, ऐसा मधुर स्वभाव ||
तुम्हीं सिंधु साहित्य हो ,भारत का अभिमान |
बढ़ता ही तुम से रहा, हिन्द देश का मान ||
हिन्दी साधक हम सभी, जगत रहा पहचान |
विश्व पटल पर हिंन्द की , हिन्दी अद्भुत शान ।।
हिंदी को मिलता अगर,हिंद देश में मान।
फिर ना होता दूसरी,भाषा का अभिमान।।
हिंदी से पहचान का ,है अपना आधार।
होता क्यूॅं फिर देश में ,इस पर अत्याचार।।
हिन्दी में सब काज कर , दें हिन्दी को मान।
रहे राष्ट्रभाषा यही, है सबका आह्वान ||
- डॉ कामिनी व्यास रावल
उदयपुर
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