काव्य :
न्याय
गुनाह कर सर उठाये बोलता है,
गीता कि क़सम खाकर न्याय तौलता है।
अपने गुनाहों मे डाल पर्दा खड़ा हुआ है,
शातिर सा औरों के राज खोलता है।
नागों सा विष भरा है, उसमें
कशमकश भय मे देखो प्रेम घोलता है।
खड़ा है, झूठ और सच के तह मे
नुमाइश ऐसी है कि बेखौफ़ डोलता है।
सच कि बुनियादें खिलाफ है, उसके
फिर भी वह झूठ हर बार बोलता है।
- उमेन्द्र निराला
-इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय
प्रयागराज (उ. प्र.)
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