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गरीबी, आतंक और जेन – जी - सत्य प्रकाश , दिल्ली


 

गरीबी, आतंक और जेन – जी

 - सत्य प्रकाश , दिल्ली

पहले अफगानिस्तान, फिर बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल के बाद भारत में जेन -जी के चर्चें हैं। हताशा, निराशा, परिवारवाद और भाई भतीजावाद से भरे नेताओं और बुद्धिजीवियों को जेन - जी से बडी उम्मीदें हैं। कच्चे मन और असीम ऊर्जा से युवाओं को राख में बदलकर ये लोग महलों तथा सत्ता के शीर्ष संसद गलियारों के सपनें देख रहे हैं। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मत प्रणाली में मात खाये नेता अब सत्ता में आने के लिए मध्ययुगीन तरीके पर भरोसा करने लगे हैं। अफगानिस्तान इसका सफल उदाहरण रहा जहां एक ही सोच के लोगों ने बलवा - दंगा और मार काट करके सत्ता हासिल कर ली। हालांकि इसमें जेन - जी जैसा कुछ नहीं था लेकिन श्रीलंका, बंगलादेश और नेपाल में सत्ता लोलुप लोगों ने जेन - जी का प्रयोग सत्ता हासिल करने में किया और देश को अराजकता की ओर धकेल दिया। जेन - जी , युवाओं की ऊर्जा पर किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए। यह वेग से बहती - उफनती उस नदी की तरह है जो प्रवाह में सब कुछ उखाड देती है, बहा देती और स्वयं रेत के मैदानों में खत्म हो जाती है।

आजादी के बाद बेइंतहा गरीबी और विवशता से भरे दक्षिण एशिया के समाज में राजशाही नेता और नव लोकतांत्रिक व्यवस्था से उपजे नये राजवाडे आम जनता को सुनहरे दिनों के सपने दिखाने में तो कामयाब रहे लेकिन पूरा करने में कोई कर्मठता प्रदर्शित नहीं कर सके। अलबत्ता उनके परिवार और भाई बंधु इसी समाज में निर्धनता के बीच धन का फूहड प्रदर्शन करते हुए अवश्य स्वर्ग भोगते रहे। इस बीच भारतीय समाज में युवाओं के बीच नशा, नक्सलवाद और आतंकवाद के नये संदर्भ सामने आये।  

भारत में बीते पांच – छह दशक में अलग अलग सरकारों ने नशा, नक्सलवाद, उग्रवाद और आतंकवाद की समस्यओं से अलग अलग ढंग से निपटने के प्रयास किये जो उनकी परिस्थितियों तथा समझ पर आधारित रहे। हालांकि इनसे मनवांछित परिणाम नहीं सके। नक्सलवाद और आतंकवाद की आड में तत्कालीन जेन - जी को प्रयोग किया गया और कहा गया कि यह गरीबी और बेरोजगारी का परिणाम है। लेकिन बारीकी से देखने पर पता चलता है कि आतंकवाद और अलगावाद की समस्या जम्मू कश्मीर में उभरी है जो अपेक्षाकृत समृद्ध राज्य है। नशे की समस्या पंजाब में सामने आयी जो कृषि और नकदी की दृष्टि से अमीर राज्य है। नक्सलवाद की जन्मभूमि बंगाल रहा और ये मध्यभारत  के आदिवासी क्षेत्रों में जडे जमाता रहा। भारतीय उप महाद्वीप में बंगाल नव जागरण का केंद्र रहा है। छोटा नागपुर के पठार में बिहार, मध्यप्रदेश, झारखंड, तेलंगाना, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश के आदिवासी क्षेत्र इससे प्रभावित रहे। पशुपतिनाथ से तिरुपति तक लाल गलियारा माना जाता था। नशे की जद में पूर्वोत्तर भारत के राज्य भी आ गये जो शांत माने जाते हैं और प्राकृतिक संसाधन और सौंदर्य से भरपूर हैं। 

दक्षिण एशिया क्षेत्र में भारत न केवल भौगोलिक रुप से और जनसंख्या में बडा देश है बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रुप से भी उसका आधिपत्य है। तो भारत में किसी भी गतिविधि का प्रभाव पूरे भारतीय भूखंड पर पडता है। भारत की आर्थिक समृद्धि का असर पूरे क्षेत्र पर स्पष्ट रुप से दिखायी दे रहा है। 

आतंकवाद, नशा, नक्सलवाद और उग्रवाद पर सरकार की सख्त नीति का असर है कि ये राष्ट्रव्यापी समस्यायें दम तोड रही हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कहना  है कि जब तक भारतीय समाज नक्सलवाद का वैचारिक पोषण, कानूनी समर्थन और वित्तीय पोषण करने वाले लोगों को समझ नहीं लेता तब तक नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई समाप्त नहीं होगी। उनका कहना है कि देश की आंतरिक और सीमाओं की सुरक्षा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के सभी अंगों के पुनरूत्थान में निहित है। देश की आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से तीन महत्वपूर्ण केंद्र जम्मू कश्मीर, पूर्वोत्तर और लाल गलियारे रहे हैं जिन्होंने प्रभावित क्षेत्रों की विकास यात्रा को थाम कर रखा और जनता तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच नहीं बनने दी। 

लगभग 70 के दशक की शुरूआत में नक्सलवाद और सशस्त्र विद्रोह की शुरूआत हुई। आंकडों के अनुसार वर्ष 1971 में स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा 3620 हिंसक घटनाएं हुईं और इसके बाद 80 के दशक में पीपल्स वॉर ग्रुप ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, झारखंड बिहार और केरल तक इसका विस्तार किया। इसके बाद 80 के दशक के बाद वामपंथी गुटों ने एक दूसरे में विलय की शुरूआत की और वर्ष 2004 में प्रमुख सीपीआई (माओवादी) गुट का गठन हुआ और नक्सली हिंसा ने बहुत गंभीर स्वरूप ले लिया। देश के भूभाग का 17 प्रतिशत हिस्सा रेड कॉरिडोर में समाहित था और इस समस्या से 12 करोड़ की आबादी प्रभावित थी। उस समय कुल आबादी का 10 प्रतिशत हिस्सा नक्सलवाद का दंश झेल रहा था। इसकी तुलना में दो अन्य केंद्र – कश्मीर में एक प्रतिशत भूभाग आतंकवाद औऱ पूर्वोत्तर में देश का 3.3. प्रतिशत भूभाग अशांति से ग्रस्त था। मौजूदा समय में पहली बार केंद्र सरकार ने बिना किसी कन्फ्यूज़न के एक स्पष्ट नीति अपनाई गयी । राज्य पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षाबलों को छूट गयी दी और इंटेलीजेंस, इन्फॉर्मेशन शेयरिंग तथा ऑपरेशन में कोऑर्डिनेशन के लिए केंद और राज्य सरकारों के बीच एक व्यावहारिक सेतु बनाया गया। बहरहाल कहा जा रहा है कि जेन - जी के आक्रोश की मुख्य वजह बेरोजगारी है। कुछ दिन पहले तक आतंकवाद, उग्रवाद, नक्सलवाद और नशे की समस्या के कारणों में बेरोजगारी ही थी। पडोसी देशों की इस कथित क्रांति के बाद युवाओं को तो कुछ नहीं मिलता  लेकिन कुछ सत्ता लोलुप लोगों राजकाज का सुख मिल जाता है और वे पहले शासक ये ज्यादा बुरे साबित होते हैं। अफगानिस्तान और बंगलादेश के हालात यही साबित करते हैं। जो कथित बुद्धिजीवी यह प्रचार कर रहे हैं कि वामपंथी उग्रवाद का मूल कारण विकास है वे देश को गुमराह कर रहे हैं। वास्तव में आतंकवाद और नक्सलवाद क्षेत्र में कौन इन योजनाओं को नहीं पहुंचने देता। सुकमा या बीजापुर में स्कूल नहीं पहुंचा तो उसका दोषी कौन है। वामपंथ प्रभावित क्षेत्र में सड़कें क्यों नहीं बन सकीं क्योंकि नक्सलियों ने ठेकेदारों की हत्या कर दी। जेन- जी को उकसाने पर भरोसा करने वाले लोग आदिवासियों की समस्याओं पर नहीं बोलते हैं। सदियों से अंधेरे में पडे समाज के पर नहीं सोचते हैं।

देश - दुनिया में तेजी से बदलते परिदृश्य में जेन - जी की मन स्थिति को गहराई से समझने की जरुरत है। मुख्यरुप से बेहतर जीवन के लिए संघर्षरत जेन - जी अब अपने और दीर्घकालीन भविष्य के बारे में सोचता है। उसकी मनस्थिति को समझने के लिए भारतीय समाज की आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परतों को भी समझने की आवश्यकता है। एक बडा वर्ग है अपने आप को सांस्कृतिक रुप से असुरक्षित समझ रहा है। विशेष तौर पर बंगलादेश की घटनाओं से एक वर्ग के युवाओं को गहराई से प्रभावित किया है। यूरोप और अमेरिका की  सामाजिक - आर्थिक स्थिति भी भारतीय जेन- जी को परेशान करने वाली है। मूल रुप से देश के किसी हिस्से से दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकात,बंगलुरु जैसे महानगरों तक पहुंचने की चाह और जो इन शहरों तक आ गये , वे यूरोप या अमेरिका में बसने के सपने में संजो रहे हैं। इसके बावजूद भी वे अपनी जडों से जुडे रहना चाहते हैं, इसलिए वे ऐसा कोई कदम उठाने में हिचकते हैं, जिससे उनके परिजनों को कोई नुकसान पहुंचे। 

भारतीय जेन - जी मूल रुप से गरीबी, बेबसी और आतंक के किसी रुप से लडने के लिए तैयार है। इसके लिए वह पूरी तैयारी के साथ सामाजिक संघर्ष में उतरता है। उसके तैयारी के लिए विश्वविदयालयों, कोचिंग संस्थानों और खेत खलिहानों और कारखानों में खटते हुए युवाओं को देखना चाहिए। ये बेहतर जीवन के सपने संजोते हुए समय पर अपने निशान छोडने के लिए तैयार हैं।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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