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कहानी : नियति-जीवन या मृत्यु - पद्मा मिश्रा , जमशेदपुर, झारखंड


कहानी : 

नियति-जीवन या मृत्यु

        त्योहारों के दिन थे. दुर्गा पूजा का पांचवां दिन ..जम्शेद्पुरके कोने कोने में पूजा के पंडाल सज गए थे. रोशनी, मेले, धार्मिक पूजा अनुष्ठान की तैयारियां जोरों पर थीं. मेरे घर से थोड़ी ही दूरी पर एक मैथिल ब्राह्मण परिवार था, पूरी तरह.कर्मकांडी.नेम टेम जोग से पूजा के उपासक .उनकी पारम्परिक पूजा का निर्वाह भी तंत्र मन्त्र ओर बलि पूजा के बिना नहीं हो पता था। उस परिवार की छोटी सी लाडली पोती गुड्डू अक्सर मेरे घर चली आती,ओर  ढेर सारी कवितायेँ अपनी तोतली आवाज में सुनाया करती थी.।आज सुबह ही तो अपनी नई  फ्राक दिखाने आई थी ''देखो दादी माँ,कित्ता सुन्दर ..मेरा फ्राक..दादी लाई है मेरे लिए'',

मैंने जरा तारीफ़ कर दी और  वो बेहद खुश।.इधर कुछ दिनों से गुड्डू नहीं आ रही थी.मैंने पूछा भी उनके बेटे से तो उसने बताया क़ि आज कल घर में ही खेलती दौडती फिरती है। मै भी संतुष्ट हो अपनी पूजा की तैयारियों में व्यस्त हो गई ।

..छन..छन..छन,,,सडक पर किसी के दौड़ते ..नन्हें कदमो की आहट सुनाई दी. मैंने झाँका तो गुड्डू थी.अरे सुन तो ,जरा सुन तो.बोलती हुई गुड्डू एक नन्हे से सलोने बकरी के बच्चे के पीछे भाग रही थी। वह भी चौकड़ी भरता.कभी इधर कभी उधर.. भाग रहा था. पैरों में घुंघरू बंधे थे ओर गले में मोतियों की माला। बहुत सुन्दर था वह बकरी का बच्चा .जिसे देख कर ही बरबस ''वाह' निकल जाये..गुड्डू दौड़ कर मेरे पास आई- देखो दादी, माँ,मेरा प्यारा दोस्त बिट्टू अभी कल ही आया है। हम दोनों खूब खेलेंगे,मस्ती करेंगे'' गुड्डू ने तो अपने नए दोस्त का नामकरण भी कर दिया था।.फिर तो वह रोज का सिलसिला हो गया,सुबह से शाम तक छुम. छनन .छन,ओर उसके पीछे दौडती भागती गुड्डू। मैंने भी उसे एक दिन ब्रेड खिलाया ओर उसके रेशमी बालों को सहलाया भी था। वह बच्चा पूरे मोहल्ले में सबका लाडला बन गया था। उसके छुम छुम में जाने कैसा सम्मोहन था. जो हमें अपनी ओर खींचता था।

फिर देवी पूजा आरती भोग में समय इस तरह बीतता चला गया की गुड्डू की याद ही न रही ।आज सप्तमी तिथि थी। बिट्टू को सुबह सुबह स्नान कराये जाते देख कर मै मुस्कराई। -गुड्डू उछल उछल कर पाइप की धार से उसे नहला रही थी।.फिर मै व्यस्त हो गयी.थोड़ी देर बादपंडित जी का  परिवारउसे लेकर कहीं जा रहा था। मैंने जानना चाहा तो पता लगा क़ि कुल देवी  के मंदिर जा रहे हैं दर्शन करने। यह एक सामान्य सी बात थी अत; मै भूल गयी। फिर तो माँ की पूजा के तीन दिन भोग आरती कन्या पूजन की व्यस्तताओं में मुझे गुड्डू.बिट्टू दोनों की याद नही रही। लगभग चार दिनों बाद सामने वाली मेरी पड़ोसन अपनी बेटी के साथ दोने में प्रसाद लेकर आईं। कुछ उदास थी । यह देख मैंने पूछा ''क्या बात है? तबियत ठीक नहीं क्या?''

-''मै तो नहीं पर गुड्डू बीमार है.।नवमी  की सुबह से ही उसे तेज बुखार जो आया तो उतरने का नाम नहीं ले रहा है, रह रह कर चौंक उठती है,बिट्टू को आवाजें लगती है.।डाक्टर भी हैरान हैंउन्होंने आज उसे अस्पताल में भर्ती करने को कहा है.'।

-''पर गुड्डू को अचानक हुआ क्या?''

वह मायूस होकर बोलीं-''उस दिन देवी के मंदिर पहुँच कर बिट्टू बीमार हो गया ,उसे ठण्ड लग गयी थी.।.रात में उसे लेकर मंदिर भी जाना था. पर वह तो ऐसा बेहोश हुआ क़ि डाक्टर बुलाना पड़ा। उसने बुखार कम करने की दवा दी। उधर पूजा की सारी तैयारियां हो चुकी थीं,पंडितजी कई बार आवाज लगा चुके थे.पर बिट्टू तो बुखार में बेहोश पड़ा था। रात दो बजे के करीब उसकी देह ठंडी हो गयी।

मैं चौंकी । अब बात कुछ कुछ मेरी समझ में आरही थी. बिट्टू पूजा मंदिर।मैंने आगे जानना चाहा-मै तो स्तब्ध थी। उन्होंने बताया क़ि फिर तो पूरे घर में मातम सा छा गया था । पूजा के लिए लाया गया''नैवेद्य नहीं रहा जरुर कोई अपशकुन या अनिष्ट होगा. परिवार में किसी होनी की आशंका से सभी दुखी थे। पैसे भी खर्च हुए थे वह भी व्यर्थ हो गए, पूजा भी नहीं हुई, ''

भोर होते ही नौकरों ने जब उसे उठाकर बाहर ले जाना चाहा तो एक धीमी सी कराह सुनाई दी''अरे, यह तो जिन्दा है,जिन्दा है चिल्लाते हुए वे सभी दौड़े, पूरा घर इकठ्ठा हो गया '' माँ की कृपा हुई है,अनिष्ट तल गया है। पूजा में कोई विघ्न नहीं आएगा,मंगल होगा ''पंडित जी सहित पूरा परिवार खुश था. मेरी सासू माँ बोली-अभी भोर के चार ही तो बजे हैं,.पूजा का समय निकला नहीं,'।फिर तो डाक्टर की मदद से  बुखार से पीड़ित मृतप्राय बिट्टू के ठीक होते ही .नहला धुला कर गेंदे की माला पहना लाल टीका लगा कर मंदिर में बलि हेतु प्रस्तुत कर दियागया। पूजा संपन्न हो गयी''। पर दिन भर बिट्टू को खोजती गुड्डू को ऐसा सदमा लगा क़ि वह  न कुछ खाती ,पीती है। न किसी से बात करती है बस बुखार में बेहोश तपते शरीर से ''बिटु'.बिट्टू'' की रट लगा रही है'' वह चुप होकर आंसू पोंछने लगी थीं।

.मैं सदमे की स्थिति में आगई थी। -''तो क्या इस दोने में रखा प्रसाद ' बिट्टू'' है?मेरी आँखों से झर झर बहते आंसुवों के बीच प्रसाद मेरे हाथों से नीचे गिर गया था।आंखें आंसुवो से तर थीं.।मेरे अधर स्वतः प्रार्थना के मन्त्र पढ़ते जा रहे थे ह उस मासूम की रक्षा करो माँ -''जगदम्ब विचित्रमत्र किम परिपुर्णाह करुनास्ति चेन्मयि  अपराध परंपरापरम न हि माता समुपेक्षते सुतं''माँ !.. तुम्हारी यह कैसी पूजा?अपने ही संतान की मृत्यु तुम कैसे स्वीकारती हो ?उस निरीह को म्रत्यु देकर फिर जीवन -दान क्यों दिया? जब  उसे छीनना ही था.यह कैसी अंध श्रद्धा है माँ? इसे क्या कहें?जीवन या मृत्यु ?-या नियति । 

 - पद्मा मिश्रा , जमशेदपुर, झारखंड

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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