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विवेक रंजन श्रीवास्तव की तीन कविताएं


विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल की तीन कविताएं

*छतनारा*


साथ यहां हैं कलम तूलिका

कोमल कोंपल जड़ें विशाल

छांव बड़ी रचनाकारों की, है छतनारा


शब्द चित्र में हैं स्पंदन

धरती है कैनवास हमारा

आसमान पर इंद्रधनुष, है छतनारा


कलाकार के हृदय बड़े हैं 

है समेटना दुनियां भर को

बांहों के हम सब के घेरे, हैं छतनारा


शुष्क हृदय वाली दुनियां में 

बम बारूद धुंध का उत्तर

शीतल मंद मधुर झोंका है, ये छतनारा


उमस भरे मौसम में  दिखते, 

घुप रातों के आसमान में बिखरे तारे

घुसती आये चांदनी जिससे, वो खिड़की छतनारा 


एक सूत्र से कला उपासक 

मिल बैठें एक वृक्ष के नीचे

जुड़ते हम जिस एक भाव से, वह छतनारा


हर मन में थोड़ा रावण है 

ज्यादा राम भरा होता है 

जो आलोकित करे राम को वो छतनारा 


अभिव्यक्ति की हैं कई विधाएं

कई माध्यम हैं कहने के, कहकर 

सुनकर मिलने वाला सच्चा सुख ही छतनारा


*सरप्लस*


बड़ी सी चमचमाती शोफर वाली 

कार तो है 

पर बैठने वाला शख्स एक ही है 

हाल नुमा ड्राइंग रूम भी है 

पर आने वाले नदारत हैं 

लॉन है, झूला है, फूल भी खिलते हैं , पर नहीं है फुरसत , खुली हवा में गहरी सांस लेनें की

छत है बड़ी सी , पर सीढ़ियां चढ़ने की ताकत नहीं बची।

बालकनी भी है 

किन्तु समय ही नहीं है 

वहां धूप तापने की

टी वी खरीद रखा है 

सबसे बड़ा , 

पर क्रेज ही नहीं बचा देखने का

तरह तरह के कपड़ों से भरी हैं अलमारियां 

गहने हैं खूब से , पर बंद हैं लॉकर में

सुबह नाश्ते में प्लेट तो सजती है 

कई , लेकिन चंद टुकड़े पपीते के और दलिया ही लेते हैं वे तथा

रात खाने में खिचड़ी, 

रंग बिरंगी दवाओं के संग 

एक मोबाइल लिए

पहने लोवर और श्रृग 

किंग साइज बेड का 

कोना भर रह गई है 

जिंदगी ।


*समय के यक्ष प्रश्न* 


एक नामी शिशु चिकित्सालय

के परिसर में 

एक भव्य शो रूम है , जहां नवजात शिशु के उपयोग की हर ब्रांडेड वस्तु सुलभ थी ।

मन में सहज ही सवाल उठा , 

क्या सचमुच इस मंहगे ब्रांडेड शो रूम में 

भावी पीढ़ी के उपयोग के सारे सरंजाम हैं ? 


क्या वातावरण की प्रदूषित हवा , 

प्रदूषित जल के जबाब हम अपनी नस्लों को आक्सीजन कैन 

और बोटल बंद पानी से  देना चाहते हैं ? 


नव दम्पति डब्बे में पैक दूध उत्साह से खरीदते दिखे तो, 

मन में प्रश्न कौंधा

बच्चे को नैसर्गिकता 

से कितने दूर ले जा रहे हैं हम ?

प्रगति के नाम पर 

प्रकृति से की जा रही हमारी छेड़ छाड़ हैं 

समय के अनुत्तरित प्रश्न

टनों कचरे से पाट रहे हैं हम

अपनी ऐतिहासिक बावड़ियां 

नदियां बन रही हैं, 

कारखानो के कचरे को ढोने वाली नालियां

जवाब है 

यथा रूप संरक्षण प्रकृति का 

जिस रूप में बुजुर्गो ने हमें सौंपा था उसे।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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