लघुकथा :
नर्क का टिकट
एक बड़ा वीआईपी व्यक्ति जब मरा, तो सीधा यमलोक पहुँचा।
यमराज ने उसे देखते ही आदेश दिया
“इसे नरक में भेजो।”
वीआईपी हड़बड़ाकर बोला—
“प्रभु! यह कैसे संभव है? मैंने तो सारे तीर्थ किए हैं, माला फेरी है, तपस्या की है, और अभी-अभी तो कुंभ स्नान भी करके लौटा हूँ। आप चाहें तो पृथ्वी पर देख लीजिए—हर अखबार, हर चैनल पर मेरे धार्मिक अनुष्ठानों की तस्वीरें छपी हैं।”
यमराज मुस्कराए और बोले—
“पुण्य धार्मिक दिखावे से नहीं, बल्कि लोगों की सेवा से मिलता है। तुम्हें जो जनता का धन टैक्स के रूप में मिला था, उससे तुम्हें उनकी सुविधाओं और भलाई का कार्य करना चाहिए था। परंतु तुमने वही धन अपने ऐशो-आराम और दिखावे पर लुटा दिया। यह जनता के साथ धोखा था, और जनता के धन का दुरुपयोग भी। इसलिए तुम्हारा स्थान नरक में ही है।”
यह सुनकर वीआईपी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
यमराज ने इशारा किया—
“जाओ उस ओर, जहाँ पहले से ही तुम्हारे जैसे जनता का धन हड़पने वाले मौजूद हैं।”
"सर आप एक बार देखो तो सही मैं बाकी वी आई पी से बिल्कुल अलग हूं। पिछले कितने साल से सारा मीडिया मेरे कार्यों का गुणगान कर रहा है और आप......"
"स्वर्ग में स्थान जनता की सेवा से मिलता है।
अखबारों की सुर्खियों से नहीं।" यमराज ने निर्णायक स्वर में कहा
आखिर वी आई पी सिर झुकाए नर्क की ओर चल दिया।
उधर, स्वर्ग में गरीब जनता के लोग आनंद में झूम रहे थे। वे प्रसन्न थे कि कम-से-कम यहाँ तो सही न्याय हुआ।
- डॉ अंजना गर्ग , दिल्ली
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