व्यंग्य :
हर हाल में खुश
- विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
समोसा किसी भी तरह गिरे , उसकी एक सतह जमीन पर होती है। इसी सिद्धांत पर पुराने समय में युद्धों में लोहे की समोसे सी तिकोने वाली ढेर सारी कीले, पैदल सेना के मार्ग में फैला दी जाती थी , और सेना को रोक कर मारा जाता था।
भारतीय मीडिया का दृष्टिकोण भी समोसे सा है। घटना कैसी भी हो अंत सिर्फ एक ही निष्कर्ष पर होता है कि इससे भारत को फायदा होगा। हमें हर हाल में खुश रहना आता है।
अमेरिका भारत पर टैरिफ बढ़ाए तो आत्मनिर्भरता , स्वदेशी का पाठ पढ़ाकर फायदा गिनाया जाता है । टैरिफ घटाए तो निर्यात ज्यादा होगा बताकर हम प्रसन्न हो लेते हैं। वीजा फीस बढ़े तो हम खुश होते हैं कि चलो देश से ब्रेन ड्रेन रुकेगा । वीजा सरल किया जाए तो फायदा समझाया जाता की हमारे युवा अमेरिका में नौकरियां पाएंगे । रूस से कच्चा तेल खरीदने पर हम इकानामी को फायदा बताते हैं । न खरीदने पर अमेरिका से बेहतर राजनीतिक सम्बन्ध का फायदा बताते हुए संतुष्ट होते हैं। यानी हर हाल में फायदा गणित का विकल्प नहीं बल्कि हमारा संतोष धर्म है।
"जो पाए संतोष धन सब धन धूरि समान । "
ये पाठ पढ़ाते मीडिया वाले ठीक उसी दादी माँ की तरह हैं जो हर स्थिति में मॉरल आफ स्टोरी निकाल देती थीं। बच्चा गिरकर रोए तो फायदा कि मजबूत बनेगा। बच्चा न गिरे तो फायदा कि संस्कार अच्छे हैं। बच्चा पढ़ाई करे तो फायदा कि डॉक्टर इंजीनियर बनेगा। बच्चा पढ़ाई न करे तो फायदा कि नेता बनेगा। मतलब हर हाल में लाभ ढूंढ लेना हमारे डी एन ए में ही है। ये सब कुछ वैसा ही है कि शादी हो जाए तो फायदा कि घर बस गया। न हो तो फायदा कि पत्नी की रोज की खटखट से बच गए।
मीडिया के इस एनालिसिस से असल फायदा होता किसे है यह कोई नहीं जानता । जनता फायदा ढूंढती रह जाती है, नेता भीड़ से फायदा ढूंढते हैं और चैनल टी आर पी में फायदा ढूंढते हैं।
बहर हाल जीएसटी घटा तो है देखें आम आदमी को फायदा कब होता है ।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
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