काव्य :
एक सुई खरीदी है
एक सुई खरीदी है।
आजकल के बच्चों के फटे जींस को सीने।
जगह जगह पर कटा-फटा है,
सोचा इस पर बना लूं कसीदे।
बहुत शौक बचपन से मुझको ,
सीलाई,कढ़ाई पेंटिंग करने का।
कोई पुरानी चीज को सुधारकर,
फिर से इस्तेमाल करने का।
जैसे ही पेंट को लगा मैं सीने,
मेरा पोता राघव दौड़कर आया।
दादा ये है आजकल की फैशन,
ये जींस तो मेरे मन को भाया।
सोचा मैंने ये जैसा फैशन,
वैसे ही रिश्तों में भी पड़ी दरारें।
सब अपनी मस्ती में मस्त हैं
किसे अपना कहकर पुकारें।
काश कोई ऐसी सुई मिल जाए,
जोड़ लूं फिर से रिश्तों को।
कितनी भी महंगी मिल जाए,
भर दूंगा मैं उसकी किश्तों को।
नहीं कहीं मिलती ऐसी सुई,
सब कैंची लिए हाथ खड़े हैं।
काट रहे हैं डोर रिश्तों की,
मुथा की सुई को लगे सड़े है।
- कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव , मुम्बई
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