[प्रसंगवश – 15 सितंबर: 5वें आरएसएस सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन पुण्यतिथि]
के. एस. सुदर्शन: हर स्वयंसेवक के हृदय में जीवित प्रेरणा
[एक जीवन, अनेक प्रेरणाएँ: राष्ट्र निर्माण का अमिट दर्पण]
जब हृदय की धड़कनें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शाखाओं-सी अनुशासित और दृढ़ हो उठती हैं, तो वे एक व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को नई ऊर्जा और प्रेरणा से भर देती हैं। लेकिन जब ये धड़कनें अचानक थम जाती हैं, तो सन्नाटा ऐसा छाता है, मानो स्वयंसेवकों की पंक्तियाँ एक पल को निस्तब्ध हो जाएँ। 15 सितंबर 2012 की सुबह, रायपुर के आरएसएस कार्यालय में प्राणायाम करते हुए के. एस. सुदर्शन का हृदय शांत हो गया। उस सन्नाटे में एक युग का अंत हुआ। आरएसएस के पांचवें सरसंघचालक के रूप में सुदर्शन जी संगठन के मार्गदर्शक और हिंदू समाज के उन स्वप्नों व संकल्पों के प्रतीक थे, जो आज भी जीवित हैं। उनकी पुण्यतिथि पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं और उनके जीवन की सादगी, विद्रोही भावना व उदारता को उजागर करते हैं। उनका जीवन राष्ट्र के गौरवमयी स्वरूप का दर्पण था, और उनकी विदाई सिखाती है कि सच्ची सेवा कभी समाप्त नहीं होती—वह युगों तक प्रेरणा देती रहती है।
कुप्पाहल्ली सीतारामय्या सुदर्शन का जन्म 18 जून 1931 को रायपुर में एक संकेटी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके माता-पिता कर्नाटक के मंड्या जिले के कुप्पाहल्ली गांव से थे। बचपन से ही वे जिज्ञासु और सक्रिय थे। नौ वर्ष की आयु में वे पहली बार आरएसएस शाखा में गए, जहाँ अनुशासन और खेल के माध्यम से राष्ट्रभक्ति की नींव देखी। यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था। जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से टेलीकॉम में गोल्ड मेडल के साथ ऑनर्स डिग्री हासिल की। उस दौर में नई पीढ़ी नौकरियों की ओर आकर्षित थी, किंतु सुदर्शन जी ने सब छोड़ 1954 में संघ का कार्य पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में स्वीकार किया। उनकी पहली जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में मिली, जहाँ उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विस्तार किया। वे मानते थे कि सच्ची आजादी हिंदू समाज के आत्मविश्वास से आएगी।
आरएसएस में उनका सफर सिपाही से सेनापति तक का था। 1964 में 33 वर्ष की आयु में मध्य प्रदेश के प्रांत प्रचारक बने, जो संगठन में दुर्लभ उपलब्धि थी। 1969 में अखिल भारतीय संगठन प्रमुखों के संयोजक बने। 1977 में पूर्वोत्तर भारत की जिम्मेदारी संभाली, जहाँ जातीय संघर्ष और विद्रोह की स्थिति थी। वहाँ उन्होंने स्थानीय भाषाओं में प्रवचन दिए, स्वयंसेवकों को संगठित किया और हिंदू एकता का बीज बोया। 1979 में बौद्धिक सेल के प्रमुख के रूप में संगठन की वैचारिक नींव को मजबूत किया। वे स्वदेशी, इतिहास लेखन और पर्यावरण जैसे विषयों पर चर्चाएँ आयोजित करते। 1990 में सह-महासचिव बने और 11 मार्च 2000 को सरसंघचालक। उनकी नियुक्ति अप्रत्याशित थी, क्योंकि हं. वी. शेषाद्रि प्राकृतिक उत्तराधिकारी माने जाते थे। किंतु सुदर्शन जी की संगठनात्मक क्षमता और मानव संसाधन प्रबंधन ने उन्हें चुना। स्वीकृति भाषण में उन्होंने बताया कि कैसे एम. एस. गोलवलकर ने उन्हें मध्य भारत का प्रभार सौंपा था, और गुरुजी के आशीर्वाद ने उन्हें स्वीकारने को मजबूर किया। 2009 तक, स्वास्थ्य कारणों से, उन्होंने यह दायित्व मोहन भागवत को सौंपा।
सुदर्शन जी के योगदान गहन और बहुआयामी थे। वे स्वदेशी के प्रखर पैरोकार थे। 1991 में स्वदेशी जागरण मंच के गठन के बाद वे इसके मार्गदर्शक बने। 1993 के दिल्ली अधिवेशन से स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा, जिसमें उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। उन्होंने मत्स्य यात्रा का नेतृत्व किया, जो विदेशी ट्रॉलरों के खिलाफ तटीय भारत की यात्रा थी। नमक आंदोलन में सामान्य नमक पर प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाई। वैश्वीकरण के खिलाफ उन्होंने चेतावनी दी कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारतीय अर्थव्यवस्था को निगल लेंगी। आरएसएस के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण स्वावलंबन, सतत उपभोग, वैज्ञानिक कृषि और हिंदू जीवन शैली को बढ़ावा दिया। इतिहास लेखन में उन्होंने औपनिवेशिक दृष्टिकोण को चुनौती दी। के. आर. मलकानी, देवेंद्र स्वरूप जैसे विद्वानों के साथ चर्चाएँ शुरू कीं, क्योंकि उनका मानना था कि सच्चा इतिहास राष्ट्र निर्माण का आधार बनेगा। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ पर समय रहते चेताया, जो आज राष्ट्रीय मुद्दा है। पूर्वोत्तर में उनके कार्य से कई जनजातीय समुदाय आरएसएस से जुड़े।
सुदर्शन जी का व्यक्तित्व केवल कठोरता का नहीं, बल्कि उदारता का भी था। 20 अगस्त 2012 को भोपाल में ईद के दिन वे ताजुल मस्जिद की ओर पैदल चले, नमाज पढ़ने या बधाई देने के इरादे से। स्टाफ और पुलिस ने ट्रैफिक का हवाला देकर रोका। यह खबर उर्दू अखबारों में छपी, और जमात-ए-इस्लामी हिंद के मुखपत्र 'दावत' ने उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त किया। संपादक परवाज रहमानी ने लिखा कि मुसलमानों को दुख हुआ कि उन्हें रोका गया। यह उनकी हिंदुत्व की कठोर छवि के विपरीत था। वे सभी भारतीयों को हिंदू मानते थे, क्योंकि उनके पूर्वज हिंदू थे। यह उनके इस्लामी विश्वासों के अध्ययन को दर्शाता था, जो 1975 की इमरजेंसी में जेल में आरएसएस और जमात कार्यकर्ताओं के करीब आने से शुरू हुआ।
उनकी सादगी भी अनुकरणीय थी। आरएसएस कार्यालयों में उन्होंने नियम बनाया: गिलास में उतना ही पानी डालो जितना पी सको। यह पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक था, जो आज जल संकट के दौर में प्रासंगिक है। वे भावुक थे, आगंतुकों से घंटों बात करते, अटल बिहारी वाजपेयी की कविताएँ सुनाते। एक बार मैसूर में सुबह की सैर पर वे लापता हो गए। सात घंटे बाद राजेंद्र नगर के एक घर में मिले, जहाँ उन्होंने आराम करने की अनुमति मांगी। घरवाले टीवी पर 'मिसिंग' न्यूज देखकर हैरान थे, किंतु सुदर्शन जी ने खुद को पहचाना। डिमेंशिया की शुरुआत थी, पर उनकी स्मृति में संघ का जज्बा बरकरार था।
विवादों से वे कभी नहीं भागे। वाजपेयी सरकार की उदारीकरण नीतियों की आलोचना की, संविधान को पुराना बताया, जो राष्ट्र के मूल स्वरूप को नहीं दर्शाता। 2001 में 'स्वदेशी चर्च' की वकालत की, जो बहस का विषय बनी। ये विवाद उनके साहस को दर्शाते थे। वे शारीरिक फिटनेस पर जोर देते, प्रतिदिन योग करते। कन्नड़, हिंदी, अंग्रेजी में प्रवक्ता थे। एकनाथ रानाडे ने उन्हें पूर्णकालिक कार्य के लिए प्रेरित किया। सुदर्शन जी ने कहा, “हिंदू समाज जल्द ही औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होकर विश्व पटल पर अपनी जगह लेगा।”
आज उनकी पुण्यतिथि पर उनकी विरासत हमें बुलाती है। वे दार्शनिक योद्धा थे, जो विचारों से लड़ते थे। नरेंद्र मोदी ने कहा, “उनका मन तीक्ष्ण, स्वभाव हास्यपूर्ण, जीवन सादा और अनुशासित था।” उनकी अनकही कहानियाँ बताती हैं कि हिंदुत्व केवल संघर्ष नहीं, समावेश भी है। स्वदेशी से आत्मनिर्भर भारत, अवैध घुसपैठ से सीमा सुरक्षा, इतिहास पुनर्लेखन से सांस्कृतिक पुनरुत्थान—उनके सपने आज साकार हो रहे हैं। सुदर्शन जी अमर हैं, क्योंकि वे हर उस स्वयंसेवक के हृदय में जीवित हैं, जो राष्ट्र के लिए समर्पित है। उनकी विदाई नहीं, यह नई शुरुआत है—एक ऐसे भारत की, जहाँ हिंदू गौरव विश्व गुरु बने।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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