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काव्य : किराएदार - मिष्टी गोस्वामी , दिल्ली


 काव्य : 

किराएदार


किराए का घर बदलने से क्या सिर्फ घर छूटता है

नहीं

बदल जाती है वो बालकनी

जिसमें छुप छुप कितने आंसू बहाए थे

कितना दर्द साझा किया था उस बालकनी के चांद से

सामने के फ्लैट  से आती आवाजे ,

वहां की स्ट्रीट लाइट 

जुगनुओ की आवाजें

छूट जाते हैं सालों के पड़ोसी

जो अब पड़ौसी नहीं

रिश्तेदार जैसे हो गए होते हैं

वो कुछ फूल,जिन्हें देखकर जिंदा हो जाते थे ख्वाब

वहां के ठेले, पंसारी की दुकान,वहां की धूप, चांद 

गेट पर खड़े सब्जी हाथ लिए

जल्दी में हूं ,कहकर घंटों बतियाना

जिन सड़कों से रोज का गुजरना होता था

वो अचानक पराई सी लगने लगती हैं 

अपना वही घर

किराए का घर है,याद आते ही  पराया हो जाता है

जैसे हो जाता है मायका भी पराया 

विदाई के साथ

कितना कुछ छूट जाता है ना एक साथ

लेकिन बाकि जन के लिए

छूटती हूं सिर्फ मैं

सब वहीं से हाथ हिलाकर बाय करते हैं

कुछ शायद याद भी करें

शायद याद करे - 

वो ढलता सूरज,वो बदली से झांकता चांद भी 

मेरे  साथी पड़ोसी के लिए तो सिर्फ मैं छूटी 

लेकिन मेरे लिए

कितना कुछ छूटा होगा

बार बार,हर बार

जब जब 

बदलना होगा मुझे

किराए का मकान (जिसको हर बार,घर बनाया मैने).


 - मिष्टी गोस्वामी , दिल्ली

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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