काव्य :
जख्म हों कितने भी गहरे,मुस्कुराना चाहिए
///////////////////पूर्णिका///////////////////
जख्म हों कितने भी गहरे, मुस्कुराना चाहिए ।
अपनों से हो रार ,तो फिर हार जाना चाहिए।।
राह मंजिल की चला,तो पीछे मुड़ क्या देखना,
आएं कितनी मुश्किलें,न डग मंगाना चाहिए।
यह जरूरी भी नही सब मन-मुताबिक हो तेरे,
जो मिला साथी,सफर हंसकर निभाना चाहिए।
चल सभी के साथ,उत्सव भी मना,तू गम न कर,
अपनों के खातिर स्वयं के,गम भुलाना चाहिए।
देता कोई जख्म जब, अपना कोई रोना नही,
हंस के सहना दर्द, आंसू भी न आना चाहिए।
तू स्वयं के निर्णय जब लेता नही,तो लेगा कौन,
अपने निर्णय ले स्वयं तन-मन सजाना चाहिए।
जन्मों से चलता रहा, भटका रहा,भूला रहा,
निर्मल नैया अब तेरी,भव पार जाना चाहिए।
- सीताराम साहू'निर्मल'छतरपुर मप्र
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