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जब न्याय ने स्वयं को याद दिलाया कि वह सत्ता नहीं, संकल्प है - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)


 

जब न्याय ने स्वयं को याद दिलाया कि वह सत्ता नहीं, संकल्प है

[न्याय का पुनर्जागरण: सत्ता, शोर और संदेह के पार]

[पीड़ा, प्रकृति और न्याय — एक ही करुणा के तीन स्वर]


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


न्याय के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जब सर्वोच्च अदालत अपने निर्णयों से केवल कानून नहीं बोलती, बल्कि राष्ट्र की अंतरात्मा को दिशा देती है। सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक दूरदर्शिता, संवेदनशीलता और साहस की जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है। 29 दिसंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा दिए गए दो महत्त्वपूर्ण फैसलों ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश की सर्वोच्च अदालत मात्र विधिक व्याख्याकार नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा की सजग और सशक्त संरक्षक है। एक ओर आरावली पर्वतमाला से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान लेकर पूर्व आदेश पर रोक लगाई गई, तो दूसरी ओर उन्नाव प्रकरण में दोषी कुलदीप सिंह सेंगर को दी गई राहत को तत्काल निलंबित किया गया। ये दोनों निर्णय पर्यावरण संरक्षण और पीड़ित अधिकारों की रक्षा में ऐतिहासिक मील के पत्थर हैं। इनके माध्यम से न्यायपालिका की सक्रियता, नैतिक प्रतिबद्धता और जनहित के प्रति उसकी अडिग व निर्भीक दृष्टि पूरी स्पष्टता से उभरकर सामने आती है।

आरावली से जुड़ा नवंबर 20, 2025 का निर्णय का निर्णय खनन गतिविधियों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से रास्ता खोल सकता था, जिससे पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर संकट उत्पन्न होने की आशंका थी। 100 मीटर ऊंचाई और 500 मीटर दूरी की नई परिभाषा के कारण विशाल भू-भाग संरक्षण के दायरे से बाहर जा सकता था। पर्यावरणविदों और नागरिक समाज में इससे गहरी चिंता फैल गई थी। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेकर उस आदेश पर रोक लगाना न्यायिक सजगता का उत्कृष्ट उदाहरण है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि पर्यावरण जैसे संवेदनशील विषयों में जल्दबाजी घातक हो सकती है। उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का आदेश दूरदर्शी सोच को दर्शाता है।

आरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जीवनरेखा है। यह भूजल संरक्षण, जैव विविधता, जलवायु संतुलन और मरुस्थलीकरण रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पर्यावरणविदों की आशंका के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकता था। सुप्रीम कोर्ट की रोक ने न केवल पर्यावरणीय विनाश को थामा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की रक्षा का संकल्प भी दोहराया। विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और तकनीकी जानकारों से युक्त समिति के माध्यम से बहुआयामी अध्ययन का निर्देश देना यह दर्शाता है कि अदालत भावनाओं से नहीं, विवेक और विज्ञान से निर्णय ले रही है। यह विकास और संरक्षण के संतुलन की सशक्त मिसाल है।

उधर उन्नाव मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के सबसे संवेदनशील और पीड़ादायक अध्यायों में से एक रहा है। पीड़िता ने एक प्रभावशाली राजनेता के विरुद्ध न्याय की लड़ाई लड़ी, जिसमें उसे और उसके परिवार को असहनीय यातनाएं झेलनी पड़ीं। पिता की हिरासत में मौत, परिवार पर हमले और लगातार धमकियों के बावजूद उसने हार नहीं मानी। ऐसे में दिसंबर 23, 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद निलंबित किए जाने से समाज में आक्रोश और निराशा फैलना स्वाभाविक था। यह निर्णय पीड़ित पक्ष के घावों को फिर से हरा करने वाला प्रतीत हुआ और न्याय पर विश्वास डगमगाने लगा।

सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने जिस तत्परता से हस्तक्षेप किया, उसने भरोसे को फिर से मजबूत किया। अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश पर तत्काल रोक लगाते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि जघन्य अपराधों में राहत अपवाद नहीं बन सकती। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों में संवेदनशीलता सर्वोपरि होनी चाहिए। यह फैसला केवल एक आरोपी की रिहाई रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सोच को खारिज करता है जिसमें सत्ता, प्रभाव या सहानुभूति के आधार पर अपराध की गंभीरता कम आंकी जाती है। पीड़िता की पीड़ा को न्यायिक मान्यता मिलना लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक था।

इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका न्यायिक सक्रियता की उत्कृष्ट मिसाल बनकर उभरी है। जब कभी कार्यपालिका या अन्य संस्थाएं दबाव, असमंजस या चुप्पी का रास्ता अपनाती हैं, तब न्यायपालिका का हस्तक्षेप लोकतंत्र को संतुलित करता है। आरावली प्रकरण में स्वतः संज्ञान और उन्नाव मामले में त्वरित रोक यह दर्शाती है कि अदालत जनभावनाओं और संवैधानिक मूल्यों दोनों के प्रति सजग है। यह सक्रियता केवल अधिकार क्षेत्र का प्रयोग नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का निर्वहन है। इससे आम नागरिक का यह विश्वास गहराता है कि न्याय व्यवस्था निष्क्रिय नहीं, बल्कि सतत जागरूक और जीवंत संस्था है।

सुप्रीम कोर्ट के ये निर्णय इस सत्य को और अधिक प्रखरता से स्थापित करते हैं कि न्याय केवल विधिक धाराओं की औपचारिक व्याख्या नहीं, बल्कि नैतिक साहस, संवेदनशील विवेक और संवैधानिक प्रतिबद्धता का जीवंत स्वरूप है। दबावों की आँधी, राजनीतिक प्रभावों की परछाइयाँ और सामाजिक शोरगुल जब सत्य को ढकने का प्रयास करते हैं, तब न्याय के पक्ष में अडिग खड़ा होना असाधारण दृढ़ता की मांग करता है। सर्वोच्च अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसके लिए संविधान किसी सुविधा का दस्तावेज नहीं, बल्कि सर्वोच्च मूल्य है। आरावली प्रकरण में विशेषज्ञ समिति का गठन हो या उन्नाव मामले में अनुचित राहत पर सख्त रोक—दोनों फैसले संतुलन, दूरदर्शिता और विवेकपूर्ण साहस की अनुपम मिसाल हैं। ये निर्णय प्रमाणित करते हैं कि न्यायालय तात्कालिक दबावों या प्रभावशाली वर्गों से संचालित नहीं होता, बल्कि जनहित, नैतिकता और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को अपने केंद्र में रखकर निर्णय करता है।

आरावली और उन्नाव से जुड़े ये ऐतिहासिक फैसले भारतीय न्यायपालिका की आंतरिक शक्ति, मानवीय संवेदना और अडिग प्रतिबद्धता के उज्ज्वल प्रतीक बनकर उभरे हैं। एक ओर सदियों पुरानी प्रकृति की मौन पीड़ा को स्वर मिला, तो दूसरी ओर अत्याचार से पीड़ित नारी की करुण पुकार को न्याय की संबल भरी स्वीकृति प्राप्त हुई। यह संविधान की उस जीवंत आत्मा का प्रकटीकरण है, जिसमें मानव गरिमा और पर्यावरण संरक्षण समान आदर के अधिकारी हैं। जब समय की कसौटी पर संस्थाएं डगमगाने लगती हैं, तब सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप यह सिद्ध करता है कि न्याय कभी निर्बल नहीं होता, न ही परिस्थितियों के आगे समर्पण करता है। ये निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए नैतिक प्रकाशस्तंभ बनेंगे और यह अटल संदेश देंगे कि भारत में न्याय आज भी जाग्रत है, सजग है और साहसपूर्वक सत्य के पक्ष में खड़ा है।


 - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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