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श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन - विवेक रंजन श्रीवास्तव , न्यूयॉर्क से


 

श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन 

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 

   ज्ञानरंजन हिंदी कहानी के उस युग के प्रवर्तक स्वर हैं जिन्होंने “आम आदमी” को कथा का केंद्र बनाया। उन्होंने हमारे भीतर बसने वाले मौन, असहमति और पीढ़ियों के फासले को इतने स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त किया कि उनकी कहानियाँ  समय की डायरी बन गईं। वे दैहिक जीवन से दुनिया छोड़ गए हैं। सबको किसी न किसी दिन जाना ही होता है, किन्तु वे अपने शब्द संवाद में और हमारे संस्मरणों में चिर जीवी बने रहेंगे। 

उन्होंने पहल में मुझे स्थान दिया था,  उनके निवास पर जाकर उनसे मिलने के अवसर आए , उनकी सादगी के चित्र सजीव हो रहे हैं। रेलवे प्लेटफार्म पर, किसी समारोह में अनायास कई बार मिले , चरण स्पर्श करने का यत्न करते ही कंधे पकड़ लेते थे।

नमन ज्ञानरंजन 

उनकी लेखनी में कोई कृत्रिमता नहीं थी ।  उनकी सोच  जीवन के छोटे क्षणों में बड़े अर्थ खोजती थी। उनकी कहानी  ‘पिता’ याद आ रही है।  ऐसी  कहानियाँ हमें अपने घर के भीतर झाँकने को विवश करती हैं ।  उस कमरे तक जहाँ पिता और पुत्र हृदय से नहीं, संकोच से बात करते हैं। समाज जैसे-जैसे ‘तरक्की’ की दौड़ में बढ़ा, पिता का अनुभव ‘अप्रासंगिक’ माना जाने लगा है । यही त्रासदी उनकी कथा पिता का महत्त्वपूर्ण बिंदु है।  

ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिंदी कथा साहित्य ने अपना एक  साक्षी खो दिया। किंतु उनकी कहानियों का असर  जीवित रहने वाला है। वे हमें यह याद दिलाती हैं कि तकनीक या आधुनिकता से नहीं, मनुष्यता से ही पीढ़ियाँ जुड़ी रहती हैं।  

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नीचे मैं उनकी कहानी पिता का जो कथानक स्मरण है दे रहा हूं । 

 उसी भाव को पिता पुत्र की वर्तमान पीढ़ी पर अधिरोपित कर श्रद्धांजलि स्वरूप एक नई कहानी लिख कर उन्हें समर्पित करता हूँ।

ज्ञानरंजन की कहानी — “पिता” का कथा सार

    कहानी ‘पिता’ में एक वृद्ध व्यक्ति अपने बेटे के पास शहर आता है। बेटा अब एक आधुनिक, व्यवस्थित, व्यस्त जीवन में है। वह पिता का आदर करता है, पर उस आदर में वह आत्मीयता नहीं  नियम और दूरी है।  

पिता छोटे कस्बे के, सहज और भावुक व्यक्ति हैं। शहर की ठंडी दीवारों में उन्हें अपनेपन की जगह नहीं मिलती। टीवी, फ़ोन, ऑफिस की बातें और ‘मॉडर्न’ रहन-सहन के बीच पिता धीरे धीरे खुद को असहज महसूस करने लगते हैं। कहीं कुछ कहना चाहते हैं, पर शब्द नहीं ढूँढ पाते।  

रात को वे बेटे को सोते देखते हैं और सोचते हैं , “यह अब मेरे बस का नहीं रहा।”  

यह वाक्य पूरी कहानी का सार है। “पिता” केवल एक निजी संबंध की कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ी के सोच परिवर्तन की कहानी है।  

यह उस मौन पीढ़ी की कथा है जो समझ तो सब जाती है, पर कह नहीं पाती। और उस नई पीढ़ी की भी, जो सुन तो लेती है, पर समझना भूल गई है।  

कहानी का वातावरण अत्यंत सूक्ष्म है । बेटे की व्यस्तता, पिता की निस्तब्धता, घर की ठंडी हवा, और उनके भीतर का अकेलापन ।  सब मिलकर एक अदृश्य संवाद रचते हैं। 

पुत्र पिता को नई सुविधाओं से आराम पहुंचाना चाहता है, पर आत्म संतोषी पिता को वह पसंद नहीं। 

एक दिन पुत्र खिड़की से देखता है कि पिता खटिया बाहर निकाल कर गर्मी से बचाव के लिए उस पर पानी छिड़क रहे हैं, किन्तु वह चाह कर भी कुछ कर नहीं सकता ।

ज्ञानरंजन का यह शिल्प आज भी पीढ़ीगत विमर्श का जीवंत प्रतीक है।  

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भाव रूपांतरित कथा 


“वाया वीडियो कॉल”

(ज्ञानरंजन की कहानी “पिता” का समकालीन पुनराख्यान)


लेखक : विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 

   हवाई जहाज की खिड़की से नीचे झिलमिलाती बर्फ़ दिख रही थी। बूढ़े पिता ने कौतूहल से उस परतदार सफेदी को देखा । जैसे किसी पुराने समय की चिट्ठियाँ अब बर्फ़ बनकर फैल गई हों।  

वह पहली बार बेटे के देश जा रहे थे,न्यूयॉर्क। बेटे ने महीनों पहले कहा था, “आपको देखे ज़माना हो गया, अब आ जाइए कुछ दिनों को।”  टिकिट भेज रहा हूं।

पिता की पीढ़ी के पास अनुभव के समय का सरोवर था । धीरे बहता, विचार करता, जमा होता। बेटे की पीढ़ी के पास समय नहीं, बस “शेड्यूल” था । हर मुलाकात मोबाइल पर ‘कैलेंडर एंट्री’ में दर्ज।  

एयरपोर्ट से घर तक बेटे ने गाड़ी में स्पॉटिफ़ाई पर कोई अंग्रेज़ी गाना लगाया, बीच-बीच में मोबाइल स्क्रीन पर नज़र डालता रहा। पिता खिड़की से बाहर देखते रहे। वही दृश्य जो उन्होंने कई बार कल्पना में देखे थे, उँची इमारतें, चौड़ी सड़कों का स्वप्निल अनुशासन। पर भीतर एक हल्की उदासी उठ रही थी, जिस पर वे विजय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करते , खिड़की से देखते बेटे से पूछते पर बेटे का मोबाइल नोटिफिकेशन, चौराहे के सिग्नल उसे उनसे उन्मुक्त बात करने से रोक देते । 

घर पहुँचे तो बेटे ने रोबोटिक आवाज़ से कहा, “Alexa, लाइट ऑन करो।”  

पिता मुस्कुरा दिए, यह नई दुनिया थी, जहाँ चाय तक आवाज़ से बनती थी और रिश्ते इमोजी से जताए जाते थे।  

रात को, जब बेटा लैपटॉप पर देर तक काम करता रहा, पिता ने चुपचाप खिड़की से बाहर देखा , बर्फ़ गिर रही थी।  

उन्हें याद आया, कैसे कभी गाँव में वह बेटे के लिए स्वयं घोडा बन जाते थे, और वह दौड़ में सबसे आगे निकलने का सपना देखा करता था। अब वही बेटा ऐसी दौड़ में था जिसका अंत किसी को नहीं पता।  

अगली सुबह कॉफी के साथ पिता बोले, 

“तुम्हें कभी अपने बचपन का घर याद आता है?”  

बेटे ने हँसकर कहा, “डैड, अब तो सब कुछ क्लाउड में है, लगता है यादें भी।”  

पिता ने मुस्कुराहट में अपनी भावनाएं छिपा ली।  

बेटे की पत्नी और बच्चे कोई 6 घंटे की ड्राइव पर रहते हैं, शाम को वीडियो कॉल पर बेटा अपनी पत्नी और बच्चों को दिखा रहा था “ भारत से दादाजी आए हैं।”  

पिता स्क्रीन पर झुके बच्चों को देख मुस्कुराए। उन्हें लगा, अब हर रिश्ता “वाया वीडियो कॉल” है निकट मगर असम्पृक्त।  

रात में बेटे ने पास आकर धीमे से उनका हाथ दबाते हुए कहा, “डैड, मुझे पता है आप सोचते हैं मैं दूर चला गया हूँ।”  

पिता ने उसकी ओर देखा बोले “नहीं बेटा! 

पर जो वे नहीं बोले वह था  "दूरी केवल मीलों से नहीं, संवाद और मौन से भी मापी जाती है।”  

कुछ देर बाद धीरे से बोले, “देखो, बाहर अब भी बर्फ़ गिर रही है, पर कोई आवाज़ नहीं होती।”  

बेटा चुप था। दोनों ने खिड़की से बाहर की ओर देखा।  शायद वही मौन अब दोनों पीढ़ियों के बीच था , सफेद, सुंदर और बर्फ़ सा ठंडा।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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