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सिर्फ़ जश्न नहीं, ज़िम्मेदारी भी: नया साल, नई सोच - - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)


 

सिर्फ़ जश्न नहीं, ज़िम्मेदारी भी: नया साल, नई सोच

[एक साल, एक संकल्प, एक सुरक्षित भविष्य]

[2026: जश्न का साल या ज़िम्मेदारी का इम्तिहान?]


 ·       प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

    हर नया साल एक सवाल लेकर आता है — क्या हम सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी बदलेंगे या दुनिया को भी बेहतर बनाएँगे? जिम, किताबें और बचत जैसे संकल्प हर बार दोहराए जाते हैं, पर 2026 हमसे कुछ बड़ा मांग रहा है। अब समय आ गया है कि हमारा संकल्प केवल “मैं” तक सीमित न रहे, बल्कि “हम” और “धरती” तक पहुँचे। जलवायु संकट अब भविष्य की आशंका नहीं, हमारी रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुका है। बाढ़, सूखा, जंगलों की आग और पिघलते ग्लेशियर साफ़ चेतावनी दे रहे हैं कि प्रकृति अब चुप नहीं है। ऐसे में यह वर्ष हमें पुकार रहा है — ग्रह के रखवाले बनने के लिए। यह संकल्प निजी नहीं, वैश्विक है; साधारण नहीं, बल्कि परिवर्तनकारी है। छोटे-छोटे कदम मिलकर इतिहास बदलते हैं। आज ग्रह को बचाना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बन चुका है।

आज पूरी दुनिया बाढ़, सूखा, जंगलों की भीषण आग, प्रदूषण और तेज़ी से पिघलते ग्लेशियरों की मार झेल रही है। मौसम का बिगड़ता संतुलन अब किसी रिपोर्ट या भविष्यवाणी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हर देश, हर शहर और हर इंसान के जीवन को सीधे प्रभावित कर रहा है। भारत जैसे देश में इसके असर और भी गंभीर हैं — कहीं पीने के पानी की विकट कमी है, तो कहीं ज़हरीली हवा लोगों की साँसों पर भारी पड़ रही है। ऐसे दौर में नया साल केवल उत्सव और संकल्पों का प्रतीक नहीं रह जाता, बल्कि जिम्मेदारी निभाने का अवसर बन जाता है। अब हमें ऐसे संकल्प लेने होंगे जो केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित न रहें, बल्कि पूरी पृथ्वी के भविष्य को सुरक्षित दिशा देने वाले हों।

सबसे पहला और सबसे प्रभावशाली संकल्प हो सकता है — प्लास्टिक से मुक्ति का संकल्प। आज सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर्यावरण का सबसे ख़तरनाक दुश्मन बन चुका है। यह न मिट्टी में घुलता है, न पानी में, बल्कि सदियों तक ज़हर की तरह बना रहता है। भारत में हर वर्ष करोड़ों टन प्लास्टिक कचरा नदियों और समुद्रों में पहुँचकर जलीय जीवन को नष्ट कर रहा है। मछलियाँ, पक्षी और असंख्य जीव इसकी कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हैं। हमें यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि सुविधा के नाम पर इस्तेमाल किया गया हर प्लास्टिक बैग प्रकृति पर एक अतिरिक्त बोझ है, जिसका भार आने वाली पीढ़ियाँ उठाएँगी।

इस नए साल में हम तय कर सकते हैं कि स्टील की बोतल, कपड़े का थैला और टिकाऊ सामान अपनाएंगे। बाज़ार जाते समय आत्मविश्वास से दुकानदार से कहेंगे कि हमें प्लास्टिक बैग नहीं चाहिए। दोस्तों और परिवार को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाएँगे और दूसरों को चुनौती देंगे। यह छोटा-सा कदम देखने में साधारण लगता है, लेकिन इसका असर गहरा होता है। जब आसपास कचरा कम होता है, नदियाँ साफ दिखती हैं और सड़कें स्वच्छ होती हैं, तब बदलाव का एहसास सच में महसूस होता है। यही वह संकल्प है जो धरती को राहत देता है और हमें ज़िम्मेदार नागरिक बनाता है।

दूसरा अहम संकल्प है — ऊर्जा बचत को जीवनशैली बनाना। आधुनिक जीवन में बिजली हमारी आवश्यकता बन चुकी है, लेकिन इसका अंधाधुंध उपयोग पर्यावरण पर भारी पड़ रहा है। भारत में आज भी बड़ी मात्रा में बिजली कोयले से बनती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है। हमें यह समझना होगा कि हर जलता बल्ब और हर अनावश्यक चालू उपकरण प्रकृति पर दबाव बढ़ाता है। समाधान कठिन नहीं है — एलईडी बल्ब लगाना, बिना जरूरत लाइट और पंखे बंद करना, चार्जर प्लग में न छोड़ना और सोलर विकल्प अपनाना छोटे लेकिन असरदार कदम हैं।

ऊर्जा बचत का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि इससे केवल पर्यावरण ही नहीं, हमारा जीवन भी बेहतर होता है। बिजली का बिल कम होता है, संसाधनों की कद्र बढ़ती है और आत्मनिर्भरता का एहसास होता है। कभी-कभी शाम को मोमबत्ती या हल्की रोशनी में परिवार के साथ समय बिताना रिश्तों को भी गहराई देता है। यह एहसास दिलाता है कि सादगी में भी सुख है। आज ऊर्जा बचाना कोई लग्ज़री नहीं, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी है, जिसे हर नागरिक को अपनाना चाहिए।

तीसरा शक्तिशाली संकल्प है — पेड़ों से दोस्ती करना। पेड़ केवल हरियाली नहीं, जीवन का आधार हैं। वे ऑक्सीजन देते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं, पक्षियों को घर देते हैं और धरती का तापमान संतुलित रखते हैं। फिर भी विकास के नाम पर सबसे पहले उन्हीं की बलि दी जाती है। ऐसे में “एक व्यक्ति, दस पेड़” जैसा संकल्प क्रांतिकारी साबित हो सकता है। नीम, पीपल, बरगद, आम जैसे देशी पेड़ स्थानीय जलवायु के अनुकूल होते हैं और लंबे समय तक लाभ देते हैं।

अपने मोहल्ले, स्कूल, कॉलोनी या किसी खाली ज़मीन पर पेड़ लगाइए। बच्चों को इस प्रक्रिया में शामिल कीजिए, हर पेड़ को नाम दीजिए और उसकी देखभाल को जिम्मेदारी बनाइए। आज कई ऐप्स और प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं जो यह बताते हैं कि आपका लगाया पेड़ कितना कार्बन अवशोषित कर रहा है। जब आप वर्षों बाद उस पेड़ की छाया में खड़े होंगे, तो गर्व महसूस होगा कि आपने भविष्य को कुछ लौटाया है। पेड़ लगाना केवल पर्यावरण कार्य नहीं, बल्कि भावनात्मक और नैतिक निवेश है।

चौथा ज़रूरी संकल्प है — जल संरक्षण को रोज़मर्रा की आदत बनाना। पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, फिर भी हम इसे सबसे अधिक बर्बाद करते हैं। भारत के कई शहर पहले ही जल संकट की चपेट में हैं। ऐसे में हर बूंद की कीमत समझना आवश्यक है। नल खुला न छोड़ें, बाल्टी से नहाएं, सब्ज़ी धोने का पानी पौधों में उपयोग करें और वॉशिंग मशीन हमेशा फुल लोड में चलाएँ।

वर्षा जल संचयन आज केवल विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता है। छत पर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना एक समझदारी भरा निवेश है, जो आने वाले वर्षों में बड़ी राहत देगा। जब पानी बचता है तो झगड़े कम होते हैं, खर्च घटता है और जीवन सहज बनता है। सच कहा गया है — जल ही जीवन है। इसे बचाना धरती को दिया गया सबसे बड़ा उपहार है।

पाँचवाँ संकल्प होना चाहिए — स्थानीय और मौसमी भोजन को अपनाना। आज हमारा खाना हज़ारों किलोमीटर दूर से यात्रा करके थाली तक पहुँचता है, जिससे भारी मात्रा में ईंधन खर्च होता है और कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है। इसके विपरीत, स्थानीय बाज़ार से खरीदी गई सब्ज़ियाँ और फल न केवल ताज़ा होते हैं, बल्कि किसानों की आजीविका को भी मज़बूत करते हैं। मिलेट्स और देसी अनाज स्वास्थ्यवर्धक हैं और पर्यावरण पर कम बोझ डालते हैं।

स्थानीय भोजन अपनाने से स्वाद भी बदलता है और सेहत भी सुधरती है। परिवार के साथ नई-पुरानी देसी रेसिपी बनाना रिश्तों को जोड़ता है। किसानों से सीधे बात करने पर भोजन के पीछे की मेहनत समझ में आती है। तब थाली केवल पेट भरने का साधन नहीं रहती, बल्कि प्रकृति और समाज से जुड़ाव का माध्यम बन जाती है।

इसी क्रम में हरित परिवहन को अपनाना भी समय की माँग है। छोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का उपयोग न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी है, बल्कि शरीर को सक्रिय और स्वस्थ भी रखता है। लंबी यात्राओं में बस, मेट्रो या कारपूल जैसे विकल्प प्रदूषण घटाने में सहायक होते हैं। इलेक्ट्रिक वाहन भविष्य की दिशा हैं, जो शोर और धुएँ दोनों को कम करते हैं। सुबह की साइकिल सवारी मन को ताज़गी देती है और प्रकृति से जुड़ाव को गहरा करती है।

ये सभी संकल्प साधारण नहीं, बल्कि परिवर्तन की नींव हैं। ये हमें केवल बेहतर नागरिक नहीं, बल्कि संवेदनशील इंसान बनाते हैं। वर्ष 2026 को हम धरती के नाम समर्पित कर सकते हैं — प्लास्टिक मुक्त, ऊर्जा-संवेदनशील, हरियाली से भरपूर और जल-सुरक्षित वर्ष के रूप में। ये बदलाव हमें भी भीतर से समृद्ध करेंगे, स्वस्थ बनाएंगे और जीवन को अर्थ देंगे। आज से शुरुआत करें, अकेले नहीं बल्कि समाज को साथ लेकर। याद रखें, हमारे पास रहने के लिए कोई दूसरा ग्रह नहीं है। यह धरती ही हमारा घर है, और इसकी रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। संकल्प लें — मैं धरती माँ का योद्धा बनूँगा। ताकि आने वाली पीढ़ियाँ हमें दोष न दें, बल्कि गर्व से याद करें।

  -  प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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