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नाटो और यूरोपीय संघ : शक्ति, सहमति और देशों की सैन्य सुरक्षा तथा प्रशासनिक साझा राजनीति के संगठन - विवेक रंजन श्रीवास्तव


 

नाटो और यूरोपीय संघ : शक्ति, सहमति और देशों की सैन्य सुरक्षा तथा प्रशासनिक साझा राजनीति के संगठन 

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव

       समकालीन विश्व राजनीति को समझने के लिए नाटो और यूरोपीय संघ को अलग अलग खांचों में रखकर देखना अब संभव नहीं रहा। ये दोनों संस्थाएं आज केवल संगठन नहीं हैं, बल्कि देशों की सामूहिक मानसिकता और रणनीतिक प्राथमिकताओं की अभिव्यक्ति हैं। एक ओर नाटो है जो सुरक्षा और सैन्य शक्ति का प्रतीक बन चुका है, दूसरी ओर यूरोपीय संघ है जो सहयोग, अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक एकीकरण का मॉडल प्रस्तुत करता है। इनके बीच का संबंध टकराव का नहीं, बल्कि एक ऐसे संतुलन का है जिसमें डर और विकास, दोनों साथ साथ चलते हैं।

नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना 1949 में हुई थी। आज इसके सदस्य देशों की संख्या इकतीस है। इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के साथ यूरोप के अधिकांश देश शामिल हैं। नाटो के सदस्य देशों में अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड, ग्रीस, तुर्किये, पोलैंड, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, हंगरी, रोमानिया, बुल्गारिया, स्लोवेनिया, क्रोएशिया, अल्बानिया, मोंटेनेग्रो, उत्तरी मैसेडोनिया, लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया और हाल में शामिल हुआ फिनलैंड तथा स्वीडन शामिल हैं। यह सूची केवल देशों के नाम नहीं है, बल्कि एक साझा सैन्य संकल्प का दस्तावेज है, जिसमें यह मान लिया गया है कि किसी एक पर खतरा पूरे समूह पर खतरा है।

इसके समानांतर यूरोपीय संघ की संरचना खड़ी है, जो सैन्य नहीं बल्कि राजनीतिक और आर्थिक सहयोग पर आधारित है। यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की संख्या वर्तमान में सत्ताईस है। इनमें जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, आयरलैंड, ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल, ग्रीस, फिनलैंड, स्वीडन, डेनमार्क, पोलैंड, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, हंगरी, स्लोवेनिया, क्रोएशिया, रोमानिया, बुल्गारिया, लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया, साइप्रस और माल्टा शामिल हैं। ब्रिटेन कभी इस संघ का हिस्सा था, पर ब्रेक्जिट के बाद उसने इस प्रयोग से बाहर निकलने का निर्णय लिया, जिससे यह भी स्पष्ट हुआ कि यूरोपीय संघ में बने रहना केवल लाभ का नहीं, बल्कि निरंतर समझौते का प्रश्न है।

इन दोनों सूचियों को साथ रखकर देखने पर एक रोचक तथ्य उभरता है। यूरोपीय संघ के अधिकांश देश नाटो के भी सदस्य हैं। इसका अर्थ यह है कि वही देश जो शांति, कानून और साझा बाजार की बात करते हैं, सुरक्षा के मामले में सामूहिक सैन्य शक्ति पर निर्भर हैं। यूरोप ने अपने नागरिकों को यह आश्वासन दिया है कि उनकी सीमाएं नाटो की ढाल से सुरक्षित हैं, ताकि वे यूरोपीय संघ के भीतर मुक्त आवाजाही, व्यापार और सामाजिक कल्याण पर ध्यान दे सकें। यही कारण है कि नाटो और यूरोपीय संघ को अक्सर एक ही सिक्के के दो पहलू कहा जाता है।

हाल के वर्षों में यूक्रेन संकट और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव ने इस रिश्ते को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। नाटो की सदस्यता को लेकर देशों की बेचैनी और यूरोपीय संघ के भीतर रणनीतिक स्वायत्तता की चर्चा यह बताती है कि यूरोप अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहना नहीं चाहता, लेकिन पूरी तरह उससे अलग होने का साहस भी नहीं जुटा पा रहा। यह द्वंद्व ही यूरोप की वर्तमान राजनीति की असली कहानी है।

अंततः नाटो और यूरोपीय संघ को केवल संस्थागत ढांचे के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास के उत्तर और भविष्य के प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए। नाटो यह याद दिलाता है कि दुनिया अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हुई है, और यूरोपीय संघ यह आशा जगाता है कि सहयोग से स्थायित्व संभव है। देशों की ये सूचियां दरअसल इस बात का प्रमाण हैं कि आधुनिक विश्व में अकेले चलने का साहस कम और साथ चलने की मजबूरी अधिक है। यूरोप ने इस मजबूरी को एक विचार में बदलने की कोशिश की है, और उसी कोशिश का नाम नाटो और यूरोपीय संघ है।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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