काव्य :
आईना सचका दिखाया तो बुरा मान गए
पूर्णिका
आईना सचका दिखाया तो बुरा मान गए।
उनके कर्मों से मिलाया, तो बुरा मान गए।
रोज पर्दे में छिपे, काम गलत वह करते,
उनके पर्दे को उठाया, तो बुरा मान गए।
अपना माना था खुदा,रास न उन्हें आया,
भेद जब सामने आया,तो बुरा मान गए।
सबके दिलको दुखा के, रोज मजे लेते हैं,
आपके दिलको दुखाया तो बुरा मान गए।
देखते खुश हैं कोई,उनको बुरा लगता है,
खुदके दुःखों ने सताया,तो बुरा मान गए।
निर्मल दरबार कन्हैया का न देखा जाके,
जो कन्हैया ने भुलाया तो बुरा मान गए।
- सीताराम साहू'निर्मल'छतरपुर मप्र
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