सत्ता, सेवा और समाज के त्रिकोण में हिंदुत्व की भूमिका
[हिंदुत्व का अगला अध्याय: बदलाव, संवाद और समावेश]
[हिंदुत्व शताब्दी: परंपरा से परिवर्तन की ओर बढ़ता विचार]
• प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
सौ वर्षों की यात्रा केवल समय की गणना नहीं होती, बल्कि वह विचारों की साधना, संघर्षों की तपस्या और आत्ममंथन की निरंतर प्रक्रिया होती है। हिंदुत्व की शताब्दी भी इसी ऐतिहासिक चेतना की प्रतीक है, जहां अतीत की स्मृतियां, वर्तमान की चुनौतियां और भविष्य की आकांक्षाएं एक-दूसरे में घुलकर नई दिशा रचती हैं। 27 सितंबर 1925 को नागपुर में केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा से जुड़ा एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है। एक सदी बाद यह आंदोलन स्वयं से प्रश्न कर रहा है—क्या उसकी वैचारिक दिशा समय के अनुरूप विकसित हो पाई है, या उसे नए संदर्भों में पुनर्परिभाषित करना आवश्यक है? यह शताब्दी केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण, पुनर्संयोजन और नवसृजन का ऐतिहासिक क्षण है, जहां हिंदुत्व अपनी नई पहचान को गढ़ने की प्रक्रिया में दिखाई देता है।
शताब्दी वर्ष में सरसंघचालक मोहन भागवत के विचार इस वैचारिक परिवर्तन की धुरी बनकर उभरे हैं। उनके भाषणों में हिंदुत्व को संकीर्ण धार्मिक दायरों से मुक्त कर एक व्यापक, समावेशी और मानवीय सांस्कृतिक चेतना के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे स्पष्ट करते हैं कि हिंदू होना किसी पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं, बल्कि वह एक सभ्यतागत स्वभाव है, जो भारत की विविधता को एक सूत्र में बांधता है। मुस्लिम, ईसाई या सिख—जो भी इस भूमि की साझा विरासत पर गर्व करता है, वह इस परंपरा का अभिन्न अंग है। यह दृष्टिकोण पुराने टकरावपूर्ण नैरेटिव से अलग एक नए संवादात्मक युग की घोषणा करता है, जहां सहअस्तित्व, सहयोग और सम्मान को प्राथमिकता दी जाती है। यही कारण है कि युवा पीढ़ी इस विचारधारा से जुड़ाव महसूस कर रही है और इसे भविष्य की राह के रूप में देख रही है।
री-कैलिब्रेशन की यह प्रक्रिया तब और अधिक स्पष्ट होती है, जब संघ ‘पंच परिवर्तन’ जैसे अभियानों के माध्यम से सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्यों को केंद्र में लाता है। जब भागवत जी भीमराव अंबेडकर के करुणा, पवित्रता और अनुशासन के विचारों का उल्लेख करते हैं, तो हिंदुत्व लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों से जुड़ता हुआ दिखाई देता है। यह दृष्टि युवाओं को यह सिखाती है कि राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक नारों का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक आचरण की मांग करता है। आज की पीढ़ी इस सोच को डिजिटल मंचों, स्टार्टअप संस्कृति, स्वदेशी नवाचार और पर्यावरणीय आंदोलनों से जोड़ रही है। परिणामस्वरूप, हिंदुत्व एक आधुनिक, सक्रिय और रचनात्मक पहचान के रूप में उभर रहा है, जो परंपरा और प्रगति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
फिर भी, यह वैचारिक परिवर्तन बिना सवालों और शंकाओं के नहीं है। आलोचक लगातार पूछते हैं कि क्या यह बदलाव वास्तव में आत्ममंथन का परिणाम है, या केवल समय के अनुरूप अपनाई गई एक रणनीति? क्या हिंदुत्व अपने प्रारंभिक चिंतकों जैसे विनायक दामोदर सावरकर और एम. एस. गोलवलकर की वैचारिक परंपरा से सचमुच आगे निकल पाया है, या केवल उसकी भाषा और प्रस्तुति बदली गई है? इन जटिल प्रश्नों के बीच मोहन भागवत की संवाद, मेल-मिलाप और विश्वास की अपील विशेष महत्व रखती है। वे स्वीकार करते हैं कि इतिहास ने समाज को गहरे घाव दिए हैं, लेकिन उन्हें भरने का रास्ता टकराव नहीं, बल्कि आपसी समझ और धैर्य से होकर जाता है। यह स्पष्टता हिंदुत्व को एक आत्मविश्वासी, परिपक्व और जिम्मेदार विचारधारा के रूप में स्थापित करने का प्रयास प्रतीत होती है।
समाज में उभरते नए नैरेटिव इस परिवर्तन को और अधिक मजबूती प्रदान कर रहे हैं। आज हिंदुत्व धीरे-धीरे किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय की पहचान से ऊपर उठकर सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का प्रतीक बनने की कोशिश कर रहा है। सेवा भारती, ग्राम विकास योजनाएं और शिक्षा अभियान इस दिशा में ठोस उदाहरण हैं, जहां सेवा को विचारधारा से जोड़ा गया है। युवा इन पहलों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और राष्ट्र निर्माण को केवल राजनीतिक सत्ता तक सीमित नहीं रखते, बल्कि समाज के हर स्तर से जोड़कर देखते हैं। उनके लिए हिंदुत्व अब मंदिर-मस्जिद की बहसों से आगे बढ़कर रोजगार सृजन, पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी आत्मनिर्भरता का व्यापक मंच बन चुका है, जो इसे एक जीवंत सामाजिक आंदोलन का स्वरूप देता है।
डिजिटल युग में यह विचारधारा और भी नए रूपों में सामने आ रही है। सोशल मीडिया, पॉडकास्ट, ब्लॉग और ऑनलाइन अभियानों के माध्यम से युवा अपनी सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं। वे स्वदेशी उत्पादों, हरित ऊर्जा और भारतीय ज्ञान-परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर एक नए राष्ट्रवादी विमर्श का निर्माण कर रहे हैं। हालांकि, इसके साथ-साथ इस्लामोफोबिया, असहिष्णुता और जातीय श्रेष्ठता जैसे आरोप भी उभरते हैं, जो इस आंदोलन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। संघ नेतृत्व इन प्रवृत्तियों से स्वयं को अलग रखते हुए सेवा, अनुशासन और समावेश पर निरंतर जोर देता है। इससे यह संदेश जाता है कि पुनर्संयोजन केवल भाषणों और नारों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार, सोच और सामाजिक आचरण में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए।
वैश्विक मंच पर हिंदुत्व को कई बार फार-राइट आंदोलन के चश्मे से देखा जाता है, किंतु भारत के भीतर यह स्वयं को राष्ट्र निर्माण की एक जीवंत प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। शिक्षा में भारतीय दृष्टिकोण का पुनर्स्थापन, ग्रामोदय की अवधारणा, स्वदेशी अर्थव्यवस्था का विस्तार और सांस्कृतिक कूटनीति के नए प्रयोग इसके उभरते आयाम हैं। इन सभी प्रयासों के केंद्र में युवा शक्ति खड़ी है, जिनकी ऊर्जा, तकनीकी दक्षता और नवाचारशीलता इस विचारधारा को भविष्य की दिशा में ले जा रही है। यही वह संक्रमणकाल है, जो तय करेगा कि हिंदुत्व एक सीमित और बंद विचार-प्रणाली बनकर रह जाएगा या एक खुला, संवादशील और वैश्विक समाधान प्रस्तुत करने वाला व्यापक दर्शन के रूप में विकसित होगा।
हिंदुत्व की शताब्दी एक ऐतिहासिक मोड़ का प्रतीक बनकर सामने आती है। यह वह क्षण है, जहां अतीत की विरासत और भविष्य की आकांक्षाएं आमने-सामने खड़ी होकर नई दिशा की मांग कर रही हैं। यदि समावेश, संवाद और सेवा को वास्तव में इस विचारधारा का केंद्र बनाया गया, तो हिंदुत्व विविधता में एकता का सशक्त और प्रेरक उदाहरण बन सकता है। किंतु यदि पुराने विभाजन, संकीर्णता और अविश्वास हावी रहे, तो यह ऐतिहासिक अवसर हाथ से निकल भी सकता है। युवाओं की भागीदारी, नेतृत्व क्षमता और वैचारिक परिपक्वता इस प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाएगी। संभवतः यही इस शताब्दी का सबसे बड़ा संदेश है—कि हिंदुत्व स्वयं को नए सिरे से गढ़ रहा है, और उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने पुनर्संयोजन को कितनी ईमानदारी, संवेदनशीलता और दूरदृष्टि के साथ अपनाता है।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
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