मोदी की इजरायल यात्रा के गहरे अर्थ
- सत्य प्रकाश , दिल्ली
बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच पश्चिमी एशिया में शांति के लिए अब्राहम समझौते और बहुपक्षीय मंच आईटूयूटू को देखते हुए इजरायल के साथ भारत के राजनयिक, कूटनीतिक, व्यापारिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध एक नये क्षेत्र में प्रवेश कर गये हैं जहां से दोनों पक्ष इन्हें नयी दिशा देते हुए प्रगाढ करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसके अलावा अमेरिका और ईरान के बीच बढते तनाव के मददेनजर भारतीय शीर्ष नेतृत्व की इजरायल यात्रा महत्वपूर्ण मानी गयी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हाल में इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों के संबंधों को 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' की दिशा में बढ़ाया गया है। यात्रा के दौरान श्री मोदी ने इजरायली संसद को संबोधित किया और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ द्विपक्षीय वार्ता की। यह यात्रा पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत की स्वतंत्र कूटनीति का संकेत है। प्रधानमंत्री ने यरूशलेम स्थित याद वाशेम – द वर्ल्ड होलोकॉस्ट रिमेम्बरेंस सेंटर का दौरा किया और होलोकॉस्ट के पीड़ितों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिसके गहरे निहितार्थ हैं। यह दोनों देशों के बीच भावनात्मक जुडाव का एक प्रतीक भी है।
भारत और इजरायल ने मुक्त व्यापार समझौता के लिए पहले दौर की वार्ता शुरू की है। इजरायल के हथियारों का भारत सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। दोनों देश अब केवल खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं हैं, बल्कि 'मेक इन इंडिया' के तहत सह-विकास और सह-उत्पादन पर ध्यान दे रहे हैं। नई दिल्ली में आतंकवाद विरोधी संयुक्त कार्य समूह की 10वीं बैठक आयोजित की गई, जिसमें दोनों देशों ने सीमा पार आतंकवाद की कड़ी निंदा की और 'जीरो टॉलरेंस' की नीति दोहराई। सितंबर 2025 में दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय निवेश संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे, ताकि निवेश प्रवाह को सुरक्षा और बढ़ावा मिल सके।
भारत और इजरायल, अमेरिका और यूएई के साथ मिलकर I2U2 समूह का हिस्सा हैं, जो खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में सहयोग करता है। यह समूह खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, जल और स्वास्थ्य जैसे छह प्रमुख क्षेत्रों में संयुक्त निवेश पर काम कर रहा है।
पश्चिम एशिया में शांति स्थापना के 'अब्राहम समझौते' ने भारत के लिए क्षेत्र में कूटनीति के एक नए युग की शुरुआत की है। वर्ष 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल, यूएई और बहरीन के बीच हुए इस समझौते ने भारत की दशकों पुरानी 'संतुलन बनाने की चुनौती' को काफी हद तक आसान कर दिया है। अब भारत को इजरायल और अरब देशों के साथ संबंधों को अलग-अलग रखने की जरूरत नहीं है। यह समझौता भारत को दोनों पक्षों के साथ एक साथ गहरे रणनीतिक संबंध बनाना मार्ग प्रशस्त करता है। समझौते ने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन तैयार की है। इसके माध्यम से भारत से यूरोप तक निर्बाध व्यापार मार्ग की कल्पना की गई है।
भारत, इजरायल की आधुनिक तकनीक और यूएई की पूंजी के साथ मिलकर त्रिपक्षीय सहयोग कर रहा है। उदाहरण के लिए, एक इजरायली कंपनी भारत में अपनी विनिर्माण इकाई के माध्यम से यूएई के लिए रोबोटिक सोलर प्रोजेक्ट पर काम कर रही है।
खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीयों के लिए इजरायल और अरब देशों के बीच सीधी उड़ानें और बेहतर क्षेत्रीय स्थिरता से यात्रा और व्यापार के नए अवसर खुले हैं। फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान, इजरायली पीएम नेतन्याहू ने भारत को मध्य पूर्व में एक नए 'हेक्सागन' गठबंधन के केंद्र में रखने की बात कही है, जो भारत की बढ़ती भू-राजनीतिक शक्ति का प्रमाण है
यह मंच भारत को इजरायल और अरब जगत (विशेषकर यूएई) के साथ एक साथ गहरे आर्थिक संबंध बनाने का अवसर देता है। यह समूह 'मेक इन इंडिया' और 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए यूएई की पूंजी और अमेरिका-इजरायल की उच्च तकनीक को भारत लाने का माध्यम है। यह समूह भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे को सफल बनाने के लिए कूटनीतिक आधार प्रदान करता है।
यहूदी सभ्यता और सनातन सभ्यता के संबंध तथा इस्लामी सभ्यता के अतरसंबंध बहुत जटिल रहे हैं। इजरायल की यहूदी और भारत की सनातन सभ्यताओं के बीच का संबंध इतिहास के सबसे अनोखे और शांतिपूर्ण संबंधों में से एक है। एक ओर दुनिया की कई अन्य सभ्यताओं का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है, वहीं इन दोनों प्राचीन सभ्यताओं ने आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व की मिसाल पेश की है। सनातन और यहूदी सभ्यता में कई समानताएं हैं जो इन्हें एक-दूसरे के करीब लाती हैं। ये दोनों ही दुनिया की सबसे पुरानी जीवित सभ्यताएं हैं। सनातन धर्म जहां 'वेद' आधारित है, वहीं यहूदी धर्म 'तोराह' पर आधारित है।
भारत में यहूदियों को कभी भी धार्मिक आधार पर प्रताड़ित नहीं किया गया। भारत में यहूदियों का आगमन लगभग 2,000 साल पहले (कोचीन) हुआ था और वे भारतीय समाज का अभिन्न अंग बन गए। दोनों संस्कृतियों में 'ज्ञान' और 'शिक्षा' को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। साथ ही, दोनों ही धर्मों में अनुष्ठानों, पवित्र अग्नि और शुद्धता के नियमों का विशेष महत्व है। भारत में रहने वाले यहूदी समुदाय ने अपनी पहचान सुरक्षित रखी। यहूदी और सनातन धर्म दोनों ही "धर्मांतरण" को बढ़ावा नहीं देते हैं, जो इन्हें ईसाई और इस्लाम जैसे धर्मों से अलग करता है। यही कारण है कि इन दोनों के बीच कभी विस्तारवादी संघर्ष नहीं हुआ।
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