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बचपन की देहरी पर उतरा फागुन : न पानी की बर्बादी, न रसायनों का शोर; बस फूलों की खुशबू और गुलाल की भोर


 

बचपन की देहरी पर उतरा फागुन : न पानी की बर्बादी, न रसायनों का शोर; बस फूलों की खुशबू और गुलाल की भोर


इटारसी। रंगों का कोई धर्म नहीं होता, और खुशबू की कोई सरहद। इन्हीं पंक्तियों को चरितार्थ करते हुए इटारसी के बचपन ए प्ले स्कूल और एएचपीएस के आंगन में होली का एक ऐसा मंजर दिखा, जहां रंगों से ज्यादा आत्मीयता और पानी से ज्यादा प्रेम बरस रहा था। यहां होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि मासूमों को प्रकृति और परंपरा से जोडऩे का एक इको-फ्रेन्डली सबक बन गई।
 फूलों की होली, प्रेम की बोली
जब नन्हे-मुन्ने चार्विक साहू और हरलीन राधा-कृष्ण के स्वरूप में सजे, तो लगा मानो द्वापर की लठमार होली अपनी सारी उग्रता त्याग कर 'पुष्प-होलीÓ में तब्दील हो गई है। स्कूल संचालक दीपक दुगाया के मार्गदर्शन में बच्चों ने राधा-कृष्ण की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उत्सव का आगाज किया। हवा में जब फूलों की पंखुडिय़ां उड़ीं, तो लगा कि कुदरत खुद इन बच्चों के साथ खिलखिला रही है।
 पपेट शो से मिला 'सेव वॉटर' का संदेश
होली के हुड़दंग में अक्सर हम 'जल ही जीवन हैÓ का फलसफा भूल जाते हैं। लेकिन यहां कहानी अलग थी। स्कूल हेड मंजू ठाकुर ने बताया कि बच्चों को ऑडियो-विजुअल और पपेट शो के जरिए यह समझाया कि सूखी होली खेलकर भी खुशियों के रंग उतने ही गहरे हो सकते हैं।
'पंखुड़ी-पंखुड़ी में बसती है संजीदगी यहां, गुलाल के टीके में सिमटा है सारा जहां...'
 एक्टिविटी में दिखा सृजन का रंग
होली खेलने से पहले बच्चों ने अपनी नन्हीं उंगलियों से हैंड प्रिंट आर्ट, होली कार्ड्स और फूलों की रंगोली सजाई। यह महज एक एक्टिविटी नहीं थी, बल्कि बच्चों के भीतर छिपे कलाकार का रंगों के साथ संवाद था। अंत में, जब मिष्ठान बंटा, तो चेहरों की मिठास बता रही थी कि संस्कार अगर उत्सव के साथ दिए जाएं, तो वे ताउम्र याद रहते हैं।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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