काव्य :
काश ! तुम किताब होतीं
काश ! अगर तुम किताब होती,
पढ़ते-पढ़ते ,सीने पर रखकर
सो जाता ।।
काश ! अगर तुम बहार होतीं,
फूलो पर निखार आ जाता
माली बन संजोता ,उसकी खूशबू ।।
काश ! अगर तुम फुहार होतीं ,
भिगो देता अपना तन-बदन,
बूदो॔ को दिल में , सोख लेता ।।
काश! मेरे गीतो की मल्हार होती,
हर शब्द मेरा" उन्मुक्त " होता
ओर तुम मुझे पुकार लेती ।।
काश ! अगर तुम किताब होती
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- देवेन्द्र थापक गुलमोहर भोपाल
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