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काव्य : समर्पण - देवेन्द्र थापक , भोपाल


 

काव्य : 

समर्पण 


    पुष्प कहां इंकार करता है,

     अपनी पंखुडिया छूने से

   पुष्प कहां इंकार करता है,

    अपनी खूशबू देने से

   पुष्प कहां इंकार करता है

  अपनी कलियां देने से

 पुष्प कहां इंकार करता है

 स्वयं को तोड़ लेने से

वह तो बस,

करता रहता है, "समर्पण "

अपनी पंखुडियो का,

इत्र की फुहार  के लिए 

अपनी कलियों का,

यौवन  के श्रृंगार के लिए 

प्रेम का इजहार  के लिए 

अपने स्वयं का, गिरकर माला मे

देवो पर समर्पण  के लिए 

उसका तो समर्पण ही रहता हे

सिर्फ  "समर्पण " 


 - देवेन्द्र थापक गुलमोहर भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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