काव्य :
ससुराल बनाम मायका
धैर्य, लगन और मुस्कान
खाने-पीने की फरमाइश करती,
जो मायके में बड़े ठाठ से,
चाय की केतली पहले दिखती
ससुराल में उठते ही खाट से।
आईने के आगे मटक-मटक कर
खुद को घंटों निहारा करती,
एक आलू छीलने से पहले
नाखूनों की चिंता किया करती।
वी.आई.पी. ट्रीटमेंट की आदत,
इतनी कि माँ ने हाथ से कौर खिलाया,
ससुराल में पति और बच्चों ने
नखरों से ,पीछे-पीछे खूब भगाया।
राजकुमारी जैसी हुकुम चलाती
मायके में थी सबकी जान,
ससुराल पहुँचते ही संभालती
घर की मैनेजर की कमान।
सारी चीज़ें ठीक रहें तो ठीक,
वरना “लापरवाह” कहलाती है,
सबकी पसंद निभाते-निभाते
खुद ही सबकी पसंद बन जाती है।
मायके की राजकुमारी प्यारी,
ससुराल में बन जाती है रानी,
धैर्य, लगन और मुस्कान से
सबका दिल जीतकर , बनती आदर्श निशानी ।
- श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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