काव्य :
अहंकार
अहंकार तेरे कितने रूप
अवतार, भक्ति या रूप अरूप
अहंकार तेरे कितने रूप।
शासन, अधिकार तेरी देन हैं
राज्य राजा प्रजा तेरी लेन है
एक का हो या समूह की सत्ता
समाज की गुलामी नई देन है।
धरती आसमान का आज रूप
तदाकार हो गया तेरा रूप
अहंकार तेरे कितने रूप।
गोरी काली चमड़ी में भी तू
शाक मांस भोजन में भी तू
हर पहनावे में तू ही तू
धर्म जात हर सोच में तू।
सुपरमैन का दिया रूप
भूखे को भी दिया रूप
अहंकार तेरे कितने रूप।
लेखन में तू पढ़ने में तू
कला में तू पढ़ाने में तू
समाचार प्रकाशन में तू
हर धारणा में अब तू ही तू ।
उच्च नीच सब तेरे रूप
अहंकार तेरे कितने रूप।
अब ज्ञान तू विज्ञान तू
मशीन भी बन गया तू
मंजिल से बेखबर तू
हर अंक से बेखबर तू।
जीवित मौत तेरा रूप
अहंकार तेरे कितने रूप।
शिक्षण तू शिक्षक तू
सीखे तू सिखाए तू
जीवित रखे मारे तू
भूखा रखा पेट भरे तू।
विचार व शून्य तेरे रूप
अहंकार तेरे कितने रूप।
तीर तलवार भाला तू
बंदूक तोप मिसाइल तू
बन तू टैंकर बन गया तू
चालक संरक्षण भी तू।
कैसे दिखाएगा निज रूप
अहंकार तेरे कितने रूप।
डॉ. सत्येंद्र सिंह
पुणे, महाराष्ट्र
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सत्येंद्र सिंह जी, अहंकार का वास्तविक रूप रचना से अभिव्यक्त किया है। हार्दिक बधाई🎉🎊
ReplyDeleteद्वारा - ल. जाधव