नजरिया
- विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
शाम के धुंधलके में पार्क की उस पुरानी बेंच पर राघव लगभग गिरते हुए जा बैठा। हाथ में लैपटॉप बैग का बोझ और दिमाग में कल की डेडलाइन का उससे भी भारी शोर, चेहरे पर ऐसी शिकन जैसे पूरी दुनिया का ठेका उसी ने ले रखा हो।
पास ही बैठे सफेद कुर्ते वाले माधव काका ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा और राघव की ओर देखा, जो लगातार अपने फोन की स्क्रीन को ऐसे घूर रहा था मानो उसे निगल जाएगा।
काका की आवाज़ ने हवा की शांति को हल्का सा छेड़ा, "बेटा, यहाँ तुम्हारे बैठने से ठीक पहले एक छोटी सी गौरैया बैठी थी। तुम्हारे आते ही वह उड़ गई, पर जाते-जाते अपनी चहचहाहट यहीं छोड़ गई।"
राघव ने झल्लाकर सिर उठाया, "काका, गौरैया के पास फुर्सत है, मेरे पास नहीं। नौकरी, ईएमआई और ये रोज की भागदौड़... सच कहूं तो जिंदगी का खारापन अब सहा नहीं जाता। सब कुछ बहुत कड़वा हो गया है।"
माधव काका धीरे से मुस्कुराए। उन्होंने अपनी झोली से पानी की एक बोतल निकाली और राघव से कहा, "जरा रुको।" उन्होंने बगल की झाड़ी से मिट्टी का एक ढेला उठाया और उसे पानी की बोतल में डाल दिया। पानी गंदा और मटमैला हो गया। काका बोले, "अगर मैं कहूँ कि तुम्हें ये पानी पीना है, तो?"
"कैसी बात करते हैं काका? यह तो अब पीने लायक ही नहीं रहा," राघव ने मुंह बिगाड़ते हुए कहा।
तब काका ने उसे पास ही बहती उस छोटी सी नहर की ओर ले जाकर दिखाया। उन्होंने वैसा ही एक मिट्टी का ढेला उस बहते पानी में फेंक दिया। पानी एक पल को हिला और फिर पहले जैसा ही निर्मल और पारदर्शी होकर बहने लगा।
काका ने राघव के कंधे पर हाथ रखा और बोले, "बेटा, ये जो मिट्टी है न, ये तुम्हारी रोज की परेशानियां और दुख हैं। और ये पानी तुम्हारा मन है। अगर तुम अपने मन को इस छोटी बोतल जैसा बना लोगे, तो जरा सी मुसीबत भी तुम्हारी पूरी जिंदगी को मटमैला और कड़वा कर देगी। लेकिन अगर तुम अपने मन को इस बहती नहर जैसा विशाल बना लो, तो हज़ारों मुश्किलें भी तुम्हें परेशान नहीं कर पाएंगी।"
काका चुप हो गए थे, लेकिन राघव के भीतर का शोर थम चुका था। उसे समझ आ गया था कि समस्या बाहर के हालातों में नहीं, बल्कि उसके अपने मन के संकुचन में थी। उसने गहरी सांस ली, जो पहली बार थकान की नहीं, बल्कि सुकून की थी।
वह समझ गया था कि अक्सर हम दुनिया को बदलना चाहते हैं, पर सच तो ये है कि जब हम अपना नजरिया बदलते हैं, तो दुनिया खुद-ब-खुद बदली हुई नज़र आती है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
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