काव्य :
सच की गर्दन अकड़ी
गीत
फाँस रही जालों में अपने
चिंताओं की मकड़ी।
काया के पन्नों को चाटे
दीमक सी निर्धनता
उठे प्रश्न जो मन- मंदिर में
समझे कैसे जनता
किस्मत की मुट्ठी हाथों की
रेखाओं ने जकड़ी।
अभी मदद का दाना- पानी
लड़े भूख से डटकर
कब तक यहाँ जलेगा चूल्हा
अरमानों का सजकर
बची ज़रा सी बीन- बाँध जो
लाया था घर लकड़ी।
खूब डोकरी की आँखों से
बहे अभावी सागर
परखोगे तुम आखिर कितना
बोलो नटवर नागर
बैठ गई आँगन में विपदा
आज मारकर चकड़ी।
सहनशीलता तोड़ गई दम
उसको अब दफ़नाकर
कौन हाय ले गया यहाँ से
निष्ठा को बहलाकर
चली विषैली हवा निरंतर
सच की गर्दन अकड़ी।
स्वाभिमान को आज बेचकर
मिली दवाई- रोटी
देखीं घर की चौखट पर अब
खुशियाँ छोटी-मोटी
नाच छटंकी रहा उसे दीं
लाकर अमियाँ, ककड़ी।
- उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट
'कुमुद- निवास', बरेली( उत्तर प्रदेश)
मोबा.- 98379 44187
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काव्य
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