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काव्य : उनके स्वागत में हैं हाजिर -उपमेन्द्र सक्सेना, एडवोकेट ,बरेली


 काव्य : 

उनके स्वागत में हैं हाजिर

गीत 

रही टोकरी अपनेपन की 

विश्वासों से खाली

बजी कहाँ है सम्बन्धों की 

एक हाथ से ताली। 


देख सफलता जले कभी जो

अस्तित्वों के साए

आज विफलताओं का मिलकर

 ढोल पीटने आए


उनके स्वागत में हैं हाजिर 

दुनिया भर की गाली।

बजी कहाँ है सम्बन्धों की 

एक हाथ से ताली।। 


गाँधीवादी आदर्शों से 

भरा पेट कब किस का

भूख बगावत पर उतरी तो

संवेदन है खिसका


आशा के सूरज की फीकी

पड़ी अधर की  लाली। 

बजी कहाँ है सम्बन्धों की

एक हाथ से ताली।। 


झाँक रही है आज गरीबी

मुनिया के आँचल  से

लार हाय टपकाते बादल

आवारा पागल से


बिल्ली  करने लगी दूध की

जाने क्यों रखवाली।

बजी कहाँ है सम्बन्धों की 

एक हाथ से ताली।


पीड़ा की घाटी में दूभर

हुआ सत्य का जीना

चीर रहा सुख के पर्वत का

बुरा समय क्यों सीना


कर दी किस्मत ने भी सूनी

अरमानों की थाली

 बजी कहाँ है सम्बन्धों की 

एक हाथ से ताली।


भौतिकवादी चकाचौंध में

हुई सादगी  नर्वस

हँसी व्यंजना के मुखड़े पर

स्वाभिमान है बेबस


निष्ठाओं का गला घोटकर

काम हो रहे जाली

बजी कहाँ है सम्बन्धों की 

एक हाथ से ताली।


मार रही अब वही थपेड़े

औनी- पौनी शेखी

कल तक जिनकी हालत आखिर

सब ने पतली देखी


छीन रही उजियालों का हक

आज व्यवस्था काली

 बजी कहाँ है सम्बन्धों की 

एक हाथ से ताली। 


कामनाओं की माँग भरेगी

श्रम की आज सियाही

डगर स्वावलंबी जीवन के

साथ गई है ब्याही


खिल जाएगी मुरझाई जो

खुशियों वाली डाली

बजी कहाँ है सम्बन्धों की 

एक हाथ से ताली। 


- उपमेन्द्र सक्सेना, एडवोकेट 

'कुमुद- निवास', बरेली (उत्तर प्रदेश)

 मोबा.-98379 44187

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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