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काव्य : छलना नहीं थीं - कर्नल डा गिरिजेश सक्सेना , लंदन


 काव्य : 

।। छलना नहीं थीं ।।


 छलना नहीं थीं पर छल कर गईं जीवन के इस छोर पर।

भूल कर भी सोची नहीं यह त्रासदी टूट गई क्युं डोर पर।।


पहले कितने कितने थे दूर,फ़िर भी इतने इतने थे पास।

अब इतनी मुश्किल दूरी है, ये  कैसी-कैसी मजबूरी है।

 उत्कर्ष की राह के इस छोर, छा गई घटा घनघोर पर।


पहले सुबह शाम बतियाते थे, बातों बातों मे लड़ जाते थे।

अब कैसी कैसी ख़ामोशी है, मेरी जान पर बन आती है।

टूटी हुई इस गुफ्तगू से, अच्छा था जुबां‌दराज़ी दौर पर‍।


जब जब मन आता मिल जाते, पंख लगा उड़ जाते थे।

पड़ी पैरों मे जैसे बेड़ी है,कैसे दौड़ मिलें हूक सी आती है।

दरिया ए आतिश‌ पार तुम,  हम ठगे खड़े इस छोर पर।


छलना नहीं थीं पर छल कर गईं जीवन‌ के इस‌ छोर पर।

भूल कर भी सोची नहीं यह त्रासदी टूट गई क्यूं डोर‌ पर।

                

- कर्नल डा गिरिजेश सक्सेना , लंदन


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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