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पानी ढोती ज़िंदगियाँ: ‘वॉटर वाइफ’ और ग्रामीण भारत की सच्चाई -प्रो. आरके जैन “अरिजीत” शिक्षाविद् बड़वानी (मप्र)


 

पानी ढोती ज़िंदगियाँ: ‘वॉटर वाइफ’ और ग्रामीण भारत की सच्चाई

[पानी, पीड़ा और परिवर्तन: भारत के जल संकट का सामाजिक चेहरा]

[जब विवाह का कारण प्यार नहीं, प्यास बन जाए: ‘वॉटर वाइफ’ भारत]

भारत जल संकट की उस निर्णायक सीमा पर खड़ा है, जहाँ पानी की घटती उपलब्धता आने वाले समय की गंभीर चेतावनी बन चुकी है। नीति आयोग और केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, 2021 में देश में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 1486 घन मीटर थी, जो 2031 तक घटकर 1367 घन मीटर रहने का अनुमान है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो 2050 तक यह आंकड़ा 1140 घन मीटर तक पहुँच सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार गंभीर जल दुर्लभता की स्थिति है। 1700 घन मीटर से कम उपलब्धता को जल तनाव और 1000 घन मीटर से नीचे को जल संकट माना जाता है। लगभग 60 करोड़ लोग पहले ही उच्च से अत्यधिक जल तनाव में जी रहे हैं, और इसका कारण जनसंख्या वृद्धि, भूजल का अत्यधिक दोहन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और असमान वितरण है।

पानी की कमी का सबसे गहरा और मौन बोझ महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है। ग्रामीण भारत में जल लाने की जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह महिलाओं के हिस्से आती है। महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों, खासकर ठाणे जिले के डेंगनमल जैसे गांवों में ‘वॉटर वाइफ’ या ‘पानी बाई’ जैसी कठोर सामाजिक व्यवस्था इसका सबसे तीखा उदाहरण है। यहाँ पानी की कमी इतनी चरम है कि पुरुष अधिक पानी जुटाने के लिए बहुविवाह तक अपनाते हैं, ताकि महिलाओं को पानी ढोने के काम में लगाया जा सके। महिलाएं रोज 5 से 10 किलोमीटर चलकर 15–20 लीटर पानी सिर पर ढोती हैं, जिससे उनकी पीठ, गर्दन और जोड़ों में लगातार दर्द, कमजोरी और कुपोषण सामान्य हो जाता है। गर्भवती महिलाओं के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक बन जाती है।

जल संकट केवल शरीर को थकाता नहीं, बल्कि लड़कियों के सपनों और शिक्षा की बुनियाद को भी धीरे-धीरे कमजोर करता है। जब पानी का स्रोत घर से दूर होता है, तो कई परिवार मजबूरी में बेटियों को स्कूल भेजने की बजाय पानी लाने के काम में लगा देते हैं। सूखे के समय स्कूलों में लड़कियों की उपस्थिति तेजी से घट जाती है। स्वच्छ जल और शौचालय की कमी मासिक धर्म स्वच्छता को और कठिन बना देती है, जिससे कई किशोरियां पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं। यह स्थिति लैंगिक असमानता को और गहरा और स्थायी बनाती है। साथ ही, दूर-दराज पानी लेने जाना कई बार सुरक्षा जोखिम और हिंसा की आशंका बढ़ा देता है, जिससे उनका आत्मविश्वास, स्वतंत्रता, शिक्षा और अवसर—चारों सीमित हो जाते हैं।

इस गहरे संकट के बीच सबसे मजबूत उम्मीद की किरण उन्हीं हाथों से उभर रही है, जो सबसे अधिक पीड़ा झेल चुके हैं। जो महिलाएं कभी पानी के लिए लंबी दूरी तय करने को मजबूर थीं, आज वही बदलाव की अगुवाई कर रही हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में दलित और पिछड़ी समुदायों की महिलाएं ‘जल सहेली’ और ‘पानी की दीदी’ बनकर पुराने कुओं, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों को फिर से जीवित कर रही हैं। वे वर्षा जल संचयन, तालाबों की सफाई और स्थानीय जल संरचनाओं के पुनर्निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। कई स्थानों पर महिलाएं छोटे जल भंडारण ढांचे बनाकर खेती, पशुपालन और घरेलू जरूरतों को मजबूत आधार दे रही हैं। अब वे केवल पानी लाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जल प्रबंधन, गुणवत्ता निगरानी और सामुदायिक नेतृत्व की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं, जो बदलाव की एक नई और सशक्त दिशा दिखाता है।

जल जीवन मिशन ने सरकारी स्तर पर ग्रामीण भारत की जल आपूर्ति व्यवस्था में उल्लेखनीय और ठोस बदलाव किया है। 2019 में जहाँ केवल 3.23 करोड़ यानी 16.7 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन पहुँचा था, वहीं मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर 15.82 करोड़ घरों यानी 81.71 प्रतिशत तक पहुँच गई है। इस अवधि में लगभग 12.58 करोड़ नए घरों तक नल से जल उपलब्ध कराया गया है। इसका सीधा प्रभाव महिलाओं के जीवन पर पड़ा है, क्योंकि जो समय पहले रोज़ पानी ढोने में खर्च होता था, वह अब काफी हद तक बच रहा है। स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों तक भी जल आपूर्ति में सुधार हुआ है, जिससे बुनियादी सुविधाएँ मजबूत हुई हैं। फिर भी, देश अभी भी लगभग 85 प्रतिशत भूजल पर निर्भर है और अपशिष्ट जल प्रबंधन की चुनौती गंभीर बनी हुई है।

2026 में सच्चा परिवर्तन तभी संभव होगा जब जल संकट को केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और लैंगिक प्रश्न के रूप में समझा जाए। जल प्रबंधन की नीति और निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं को केंद्र में रखना अनिवार्य है। ग्राम स्तर की जल समितियों में उनकी नेतृत्व भूमिका सुनिश्चित करनी होगी, ताकि योजनाएँ जमीनी जरूरतों से जुड़ सकें। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण को बड़े पैमाने पर अपनाना अब समय की मांग है। साथ ही जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए सूखा और बाढ़ दोनों से निपटने के लिए एकीकृत रणनीति विकसित करनी होगी। शिक्षा व्यवस्था में जल संरक्षण को शामिल करना भी आने वाली पीढ़ियों में जागरूकता और जिम्मेदारी विकसित करने के लिए जरूरी है।

अंतिम सच्चाई यही है कि भारत का जल संकट केवल पानी की कमी की कहानी नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक असमानता और महिलाओं के अदृश्य श्रम का प्रतिबिंब है। ‘वॉटर वाइफ’ जैसी कठोर हकीकतों से लेकर सूखे कुओं को फिर से जीवित करती दलित महिलाओं तक, यह साफ दिखाई देता है कि संकट की सबसे तीखी मार भी महिलाएं झेलती हैं और समाधान की दिशा भी वे ही दिखाती हैं। यदि 2026 में ठोस नीतिगत, सामाजिक और सामुदायिक कदम उठाए जाएँ, तो 2050 के संभावित जल दिवालियापन को टाला जा सकता है। पानी बचाना केवल संसाधन संरक्षण नहीं, बल्कि समानता, सम्मान और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने की निर्णायक जिम्मेदारी है।


प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल: rtirkjain@gmail.com

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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