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पृथ्वी प्रदत्त संपदा का दोहन करो - - शोषण नहीं --डॉ बी आर नलवाया , मन्दसौर


 

विश्व पृथ्वी दिवस विशेष

पृथ्वी प्रदत्त संपदा का दोहन करो - - शोषण नहीं

 --डॉ बी आर नलवाया

शिक्षाविद एवं पर्यावरण चिंतक 

प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर

    यह  शाश्वत  सत्य है, कि प्रकृति या पृथ्वी सभी का ध्यान रखती है। लेकिन यह भी वास्तविकता है, कि मानव प्रकृति की अपेक्षित परवाह नहीं करता है। इसी वजह से प्राकृतिक असंतुलन उत्पन्न हो रहा है , और इसका असर  दिखाई देने लगा है। किसी ने कहा- *प्रकृति का दोहन करो, लेकिन शोषण मत करो* अब सभी को प्रकृति के प्रति  चिंतन कर,  इस दिशा में कोई ना कोई योगदान अवश्य करना चाहिए । कोई भी व्यक्ति यह कह कर नहीं बच सकता है, कि उनके करने भर से क्या हो जाएगा ? यह समझना भूल होगी, कि प्रकृति उसका शोषण करने वाले किसी व्यक्ति को बख्श देगी। आज नहीं तो कल उसे इसके परिणाम भुगतने हीं होंगे । अब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक होकर, इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाए रखना है। 

  मानव की प्रकृति या पृथ्वी के साथ प्रतिकूल गतिविधियों  के चलते हमारी  पृथ्वी अनेक प्रकार के झंझावत झेल रही है। आधुनीकीकरण दशा के अन्तर्गत विकास में कई प्राकृतिक संसाधनों के  अंधाधुंध दोहन से पृथ्वी का संकट गहरा रहा है। इससे देश की नही बल्कि विदेशों में भी प्राकृतिक तबाही होती रहती है। इस तबाही की अनेक घटनाएँ विश्व भर में अब कहीं अधिक देखने को मिल रही है। प्रकृति का ऐसा व्यवहार जहाँ  चिंतनीय है, वहीं यह सोचने को मजबूर कर रही है, कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ।  यह तथ्य किसी से छुपा नहीं कि इन प्राकृतिक संकटों में मूल जलवायु परिवर्तन है, यह जाहिर है, कि जलवायु परिवर्तन के  दुष्परिणाम वर्ष पर नए-नए रूप में प्रकट होते ही रहे हैं ।जलवायु परिवर्तन का प्रभाव से पिछले वर्षो में देश व विदेशों में  लू का प्रकोप,  भारी वर्षा से बाढ़ , जंगलों में आग से वन क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं ,यही नहीं अनेक 

देशों में पहाडी क्षेत्रों के जलाशय सूख रहे हैं, वही बरसाती नदियाँ  सूख रही है। तो बड़ी नदियों में  पानी की  मात्रा लगातार घट रही  है। इस तरह महासागर हो, या पहाड़, नदियाँ हो या खेती की जमीन सब जगह प्रकृति कराह रही है। इस तरह पृथ्वी की संपूर्ण जैवविविधता खतरे में पड़  गई हैं। 

ऐसी स्थिति में मानव की प्रतिकूल गतिविधियों से प्रकृति  हांफने  लगी है।

 अब हम कोई दूसरी पृथ्वी नहीं ला सकते है। अभी समय है चेतने का, सुधरने का ,अधिक उपभोग की प्रवृति को रोकने का। अगर हम अभी भी नहीं चेते तो, संकट इतना गंभीर हो सकता है, कि उससे निपटना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। यह स्पष्ट है , कि भविष्य के खतरों से बचना है, तो प्रकृति के साथ साम्य बनकर चलने के साथ  प्राचीन परंपरा को अपनाना होगा। अब हमे प्रकृति आधारित समाधान की आवश्यकता है। 

जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों का अनुमान दशकों  पहले से लगाया जाने लगा था। लेकिन इससे निपटने के लिए ठोस कदम नही उठाए गए। लिहाजा आज वैश्विक तापमान एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। अगर 2050 तक हमें विश्व के तापमान को औद्योगिकरण से पहले की स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ने देना है,  तो ईधन का उपयोग कम करना होगा। यह भी सच है कि अगर 2035 तक ग्रीन हाउस उत्सर्जन में 60 प्रतिशत तक कटौती होनी है तो 2030 तक ग्रीन हाउस उत्सर्जन में 43 प्रतिशत की कटौती होनी चाहिए। तभी हम 2050 के नेट जीरो लक्ष्य तक पहुंचने पहुंच पाएगें तो तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोक पाएंगे। हम जीवाश्म ईंधन के अलावा अगर किसी उर्जा पर निर्भर हो सकते है , तो वह अक्षय ऊर्जा ही होगी। अक्षय ऊर्जा की क्षमता को तीन गुना करनी होगी, तभी हम लक्ष्य तक पहुंचेंगे। 

हम खाने, पहनने, फाइबर ओर लकड़ी आदि के लिए जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करते उतना अधिक दोहन के शोषण को 'बदलने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन की बात करते समय सबका ध्यान तापमान की ओर ही है, लेकिन जमीन/ पृथ्वी के इस्तेमाल में आ रहे बदलाव पर किसी का ध्यान नहीं है।

 उपभोक्तवाद, भौतिकतावादी जीवन शैली में  बदलाव की आवश्यकता है। सभी तरह की  बर्बादी रोकनी होगी।  जलवायु परिवर्तन रोकने की जिम्मेदारी न केवल पर्यावरण संगठनों की और सरकारों की है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को पृथ्वी को बचाने के लिए तैयार रहने की है। 

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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