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गुम होता बचपन - लक्ष्मी चौहान , देहरादून, उत्तराखंड


 

गुम होता बचपन

रिया की मुस्कान पूरे मुहल्ले में मशहूर थी। वह जितनी होनहार छात्रा थी, उतनी ही शरारती भी। उसकी खिलखिलाहट से न केवल घर, बल्कि स्कूल का वातावरण भी चहक उठता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से रिया के व्यवहार में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी।

रिया अब न तो दोस्तों के साथ खेलने जाती थी और न ही किसी से बात करती थी। उसके स्वभाव में एक अनजाना चिड़चिड़ापन आ गया था और डर के कारण उसे रात-रात भर नींद नहीं आती थी। उसके माता-पिता अपने काम की व्यस्तता में इतने डूबे थे कि वे रिया की इस मानसिक उथल-पुथल को समझ ही नहीं पा रहे थे। जब भी रिया उनसे कुछ कहने की कोशिश करती, वे 'अभी व्यस्त हैं' कहकर उसकी बात टाल देते।

जब रिया के दोस्तों ने महसूस किया कि उनकी चुलबुली सहेली अब गुमसुम रहने लगी है, तो उन्होंने अपनी टीचर नंदिनी मैम को यह बात बताई। नंदिनी मैम रिया को बहुत अच्छे से जानती थीं। उन्हें ताज्जुब हुआ कि जो बच्ची इतनी बेबाक और खुशमिजाज थी, वह अचानक उम्र से पहले इतनी गंभीर कैसे हो गई?

अगले दिन नंदिनी मैम ने रिया को स्कूल में जल्दी बुलाया और उसे अपने केबिन में ले गईं। उन्होंने बड़े प्यार से पूछा, "बेटा, मैं देख रही हूँ कि तुम कुछ दिनों से बहुत उदास हो। क्या बात है? तुम मुझे अपनी दोस्त समझकर सब कुछ खुलकर बताओ।"

शिक्षक का स्नेह पाते ही रिया की आँखें नम हो गईं। वह उनसे लिपटकर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। जब उसका मन हल्का हुआ, तो उसने उस डर का खुलासा किया जिसने उसका बचपन छीन लिया था। रिया ने बताया कि जब वह नानी के घर से लौट रही थी, तो किसी ने उससे कह दिया था कि "तुम्हें कोई उठाकर ले जाएगा।"

उसी दौरान रिया ने टीवी पर एक नाटक देखा था जिसमें एक बच्ची का अपहरण कर उसे बेच दिया जाता है। हालांकि वह एक काल्पनिक नाटक था, लेकिन रिया के बाल-मन पर इसका इतना गहरा असर हुआ कि उसने घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया। उसके लिए स्कूल से घर और घर से स्कूल तक का सफर भी डर से भर गया था।

नंदिनी मैम ने रिया की बात सुनकर महसूस किया कि किसी की एक छोटी सी डरावनी बात ने बच्ची के मन में घर कर लिया है। उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, "बेटा, तुम बहुत बहादुर हो। बस तुम्हें सतर्क रहने की ज़रूरत है। किसी अनजान से बात मत करो, लेकिन डरकर अपनी खुशियाँ छोड़ देना सही नहीं है।"

मैम ने तुरंत रिया के माता-पिता को स्कूल बुलाया और उन्हें रिया की मानसिक स्थिति के बारे में बताया। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ कि काम की आपाधापी में वे अपनी फूल जैसी बच्ची को समय ही नहीं दे पाए। रिया के माता-पिता ने उससे वादा किया कि वे अब उसे पूरा समय देंगे और उसकी हर बात सुनेंगे।

एक नई शुरुआत:

रिया के माता-पिता ने उसका आत्मविश्वास वापस लाने के लिए उसे 'सेल्फ डिफेंस' (आत्मरक्षा) की ट्रेनिंग दिलवानी शुरू की। उन्होंने उसे समझाया कि न्यूज़ या टीवी की हर बात से डरने के बजाय उसे खुद को मानसिक रूप से मज़बूत बनाना चाहिए। धीरे-धीरे रिया का डर गायब होने लगा और उसकी वह पुरानी शरारती मुस्कान फिर से लौट आई।

एक सामाजिक संदेश

रिया की समस्या तो सुलझ गई, लेकिन समाज में आज भी कई बच्चे ऐसे हैं जो अनजाने डरों और अनकहे सवालों से जूझ रहे हैं। टीवी और इंटरनेट पर दिखाई जाने वाली हर चीज़ बच्चों के लिए सही नहीं होती। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के लिए ऐसा सुरक्षित माहौल बनाएँ जहाँ वे खुलकर जी सकें। बचपन ज़िन्दगी का वह हिस्सा है जिसे बिना किसी फिक्र के जिया जाना चाहिए। हम सभी का यह दायित्व है कि हम अपने आस-पास ऐसा वातावरण निर्मित करें कि हर बच्चा खुद को आज़ाद और सुरक्षित महसूस कर सके।

-   लक्ष्मी चौहान , देहरादून, उत्तराखंड

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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