भारतीय ज्ञान परंपरा ही नई शिक्षा नीति का मूल आधार है - प्रो. स्वाति पाल
दिल्ली। आज समाजशास्त्र विभाग ने, जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज के भारतीय ज्ञान प्रणाली अध्ययन केंद्र के सहयोग से, “भारतीय ज्ञान प्रणाली: स्थानीय परंपराएँ और वैश्विक लक्ष्य” विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। यह आयोजन नई शिक्षा नीति के पाठ्यक्रम के अनुरूप था, जो विद्यार्थियों में अनुसंधान-उन्मुख दृष्टिकोण विकसित करने पर बल देता है। इस सम्मेलन ने विशिष्ट विद्वानों और युवा शोधकर्ताओं को एक मंच पर लाकर सार्थक अकादमिक संवाद और विचार-विनिमय का अवसर प्रदान किया।
सम्मेलन का आरंभ एक मुख्य व्याख्यान सत्र से हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्राचार्या प्रो. स्वाति पाल ने की। उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक “घोषणापत्र” के रूप में प्रस्तुत करते हुए इसके गतिशील और विकसित होते स्वरूप पर बल दिया। मुख्य व्याख्यान प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो. वर्जिनियस ज़ाक्सा, (अतिथि प्रोफेसर, मानव विकास संस्थान, नई दिल्ली) द्वारा दिया गया, जिसमें उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली के संदर्भ में ग्रामीण–शहरी–जनजाती य निरंतरता के महत्व को रेखांकित किया।
इसके बाद एक पैनल चर्चा आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता प्रो. तनुजा कोठियाल (इतिहास विभाग, डॉ. बी. आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली) ने की। इस पैनल में प्रो. मधुलिका बनर्जी (राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. प्रोबल रॉय चौधरी (पूर्व निदेशक, सेंटर फॉर न्यू इंडियन स्टडीज़, सिस्टर निवेदिता विश्वविद्यालय, कोलकाता), प्रो. मणि शेखर सिंह (समाजशास्त्र के प्रोफेसर एवं कार्यकारी निदेशक, सेंटर फॉर लॉ एंड ह्यूमैनिटीज, ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी), प्रो. हिना ज़िया (प्रमुख, योजना विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया), डॉ. अम्फू टेरांगपी (सहायक प्रोफेसर, विजुअल स्टडीज़, जेएनयू) तथा डॉ. धुर्र्जटि शर्मा (सहायक प्रोफेसर, आधुनिक भारतीय भाषा एवं साहित्य अध्ययन विभाग, गौहाटी विश्वविद्यालय) शामिल थे। पैनल चर्चा में मौखिक परंपराओं, पर्यावरणीय प्रथाओं, स्वदेशी कला और उपनिवेश-पूर्व साहित्यिक संस्कृतियों जैसे विषयों के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणाली पर विचार किया गया, जिसमें कठोर द्वैतों की बजाय निरंतरता और जीवनानुभव पर जोर दिया गया।
इसके पश्चात पाँच विषयगत सत्र आयोजित किए गए, जिनमें देशभर से आए तीस से अधिक युवा शोधकर्ताओं ने भाग लिया और इन चर्चाओं को और गहराई प्रदान की। इन सत्रों की अध्यक्षता प्रो. मधुलिका बनर्जी, डॉ. राकेश बटब्याल (एसोसिएट प्रोफेसर, मीडिया स्टडीज़ केंद्र, जेएनयू), डॉ. स्वप्ना लिडल (भारतीय इतिहासकार, कला संरक्षक एवं क्यूरेटर), डॉ. अवितोली जी. झिमो (एसोसिएट प्रोफेसर, मानवशास्त्र विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) तथा डॉ. रितुपर्णा पटगिरी (सहायक प्रोफेसर, मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग, आईआईटी गुवाहाटी) ने की। इन सत्रों ने एक सजीव मंच प्रदान किया, जहाँ विद्वानों और युवा शोधकर्ताओं ने भारतीय ज्ञान की समृद्धि, उसकी प्रासंगिकता तथा समकालीन चुनौतियों पर विचार किया।
सम्मेलन का समापन प्राचार्या प्रो. स्वाति पाल द्वारा किया गया। इस अवसर पर विषयगत सत्रों के अध्यक्षों के साथ मिलकर उन्होंने प्रत्येक सत्र के युवा शोधकर्ताओं को “सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्र” पुरस्कार प्रदान किए, जिससे उन्हें अनुसंधान-उन्मुख दृष्टिकोण विकसित करने के लिए प्रेरित किया गया।
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