काव्य :
जिंदगी की ढलती शाम
दिवस के अवसान-
सी ही
जिंदगी की ढलती
शाम
वृक्षों की शाखाओं
से झाँकती स्वर्णिम
किरणों-सी
दिल के गलियारों में
झिलमिल यादों की
चहलकदमी
रहती है
ढलता जिस्म,कदमों
की शैथिल्यता,
काँपते हाथ
दरो-दीवार से
बाते करते रहते हैं।
निगाहों में दिन
इंतजार बनता
साँझ उदास उतरती है
नींद रातों से रुठी
करवट-करवट कटती
है
स्वप्न जवानी के
दर खटखटाकर थक
जाते हैं
बेटों के कद जब
उम्र के साथ बढ़ जाते हैं।
गलियाँ राह तकतीं
चाय की थड़ियाँ
चाय बेच-बेच बाबूजी
का इंतजार करती
थकती है
वो दोपहिया, चौपहिया
जो सफर-नौकरी पर
शहशांही सवारी
होता था
धूप-धूल में खड़ा
इंतजार करता है।
जिंदगी की ढलती
शाम
दवाइयों को मिल गया
स्थाई ठहराव
साँसों में हवाओं का
बढ़ गया दबाव
धड़कनें धीरे-धीरे
सरकने लगीं
अपनों की भीड़ भी
धीरे-धीरे खिसकने लगी
बोझ गर बन गई
ये साँझ तो
घर के आँगन में नहीं
फिर वृद्धाश्रम में
बिखर कर
मौत की शीतल गोद में
खो जाती है।
- डा.नीलम ,अजमेर
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