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काव्य : जिंदगी की ढलती शाम - डा.नीलम ,अजमेर


 काव्य : 

जिंदगी की ढलती शाम


दिवस के अवसान- 

सी ही

जिंदगी की ढलती

शाम

वृक्षों की शाखाओं

से झाँकती स्वर्णिम 

किरणों-सी

दिल के गलियारों में

झिलमिल यादों की

चहलकदमी

रहती है

ढलता जिस्म,कदमों

की शैथिल्यता,

काँपते हाथ

दरो-दीवार से

बाते करते रहते हैं।


निगाहों में दिन

इंतजार बनता

साँझ उदास उतरती है

नींद रातों से रुठी

करवट-करवट कटती

है

स्वप्न जवानी के

दर खटखटाकर थक

जाते हैं

बेटों के कद जब

उम्र के साथ बढ़ जाते हैं।


गलियाँ राह तकतीं

चाय की थड़ियाँ

चाय बेच-बेच बाबूजी

का इंतजार करती

थकती है

वो दोपहिया, चौपहिया

जो सफर-नौकरी पर

शहशांही सवारी

होता था

धूप-धूल में खड़ा

इंतजार करता है।


जिंदगी की ढलती

शाम

दवाइयों को मिल गया

स्थाई ठहराव

साँसों में हवाओं का

बढ़ गया दबाव

धड़कनें धीरे-धीरे

सरकने लगीं

अपनों की भीड़ भी

धीरे-धीरे खिसकने लगी

बोझ गर बन गई

ये साँझ तो

घर के आँगन में नहीं

फिर वृद्धाश्रम में

बिखर कर 

मौत की शीतल गोद में

खो जाती है।

      - डा.नीलम ,अजमेर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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