बचपन और गरमी की छुट्टियां
- पद्मा मिश्रा , जमशेदपुर
बीते हुए समय.में बचपन की प्यारी सुधियां,
फिर याद आ रही हैं,गरमी की छुट्टियां ।
ऊंचे पहाडों को हम छोड़कर चले थे,
अपने गृहनगर में बसाने अपनी दुनिया।
फिर याद आ रही हैं,गरमी की छुट्टियां ।
सचमुच सुदूर नैनीताल में स्कूल के दिन जितने निराले, यादगार होते थे उससे कहीं ज्यादा प्यारी लगती थी गर्मी की छुट्टियां,जिनका इंतजार रहता था हमें कि कब स्कूल बंद हों और हम.अपने गृहनगर बनारस की ओर चलें।परीक्षओं के बाद ठीक 20 मई को मेरा स्कूल बंद होता और 7 जुलाई को खुला करता था।अब इतनी लंबी गर्मी की छुट्टिया हमे किसी मनपसंद त्योहार की तरह ही बहुत अच्छी लगती थीं।बनारस जाने का मतलब हम भाई बहनों के लिए नैनीताल की ठंडी वाले कोट, ,शाल,जूतों,कनटोपों से आजादी का भी प्रतीक होता था।नये कपडे खरीदे जाते,नयी खाने की चीजें बनती घर में और पिताजी सेब,आडू खुबानी की छोटी पेटियां भी खरीद लेते थे।ट्रेन से हम काशीपुर से मुरादाबाद फिर वहां से ट्रेन बदल कर बनारस। ट्रेन का नाम अब याद नहीं रहा।बनारस वाले घर में बाबा गांव के अपने बगीचे के लंगडे आम लाकर रखे रहते थे।रेवडी चिवडा,आम के अंचार से पूरा कमरा भरा रहता था।हमारी खुशी का ठिकाना नहीं.होता था तब।आज जब हम विज्ञापन देखते हैं न कि मेहमानो का स्वागत पान पराग से करो ,सचमुच तब याद आता था कि बच्चों का स्वागत लंगड़े आम से करो।यह कल्पना भी आज.होठों पर हंसी ले आती है।बिना हाथ पांव धोये,यात्रा की.थकान मिटाये बिना हम तीनो आमों.पर टूट पडते थे।शाम को सहेलियों से मिलना होता था ,हम सब मिलकर मकान मालिक की आइसक्रीम फैक्ट्री से खूब आइसक्रीम खाते थे।मकान मालिक की.बेटी दुर्गेश मेरी प्रिय सहेली थी इसलिए कोई रोकने टोकने वाला भी नहीं था।भोर होते ही पंचगंगा घाट जाना,स्नान कर पंडा जी से तिलक लगवाकर पक्के भक्त बने हम जब लौटते तो कचौडी गली में कचौड़ी जलेबी का.नाश्ता आज भी बहुत याद आता है।आह,कितने प्यारे थे.वो दिन ।इस बार हमारे प्रवास कां आखिरी समय मेरे ननिहाल में बिताना था ।छोटी.मौसी की शादी थी ।पहली बार गांव की.शादी में शामिल होना किसी उत्सव से कम नहीं था।मौसा जी एयरफोर्स में कार्यरत थे और बारात में सीधे अपनी ड्यूटी से ही आने वाले थे।नानाजी ने उनके स्वागत में चूने से पुती दीवारों पर चित्रकारी करने का काम हम बच्चो को सौंप दिया।हमने कमल का फूल,कलश,मोर बनाया ,स्वागतम लिखा जिसे देखकर अनगढ चित्रकारी की भी तारीफ मिली थी।विवाह में.एक ओर मौसा जी को हल्दी लगती तो दूसरी ओर मौसी को।एक बार इधर चुमावन तो फिर दूसरी तरफ। बहुत मजा आ रहा था।
छुट्टियों मे बचपन के खेल भी बहुत याद आते हैं।जब बहुत छोटी थी तब हम लोग बनारस के जैतपुरा मुहल्ले में रहते थे। सुरुज शाह के मकान में तीसरी मंजिल पर। बरामदे से नीचे झांकने पर भी डर लगता था लेकिन वो बरामदा ही हमारे घर में खेल का मैदान था हमारे लिए। गुडडे गुड़िया के खेल मैने भी खेले हैं। मेरी मां पुराने कपडों और साडियों सै बहुत सुंदर गुडिया बनाती थीं।और हम सारी सहेलियाँ दिन भर उनका घर बसाने में व्यस्त रहती थीं। पिताजी के जूते को कार बनाकर उसमें हमारी गुडिया का परिवार सैर पर निकलता था। हाथ से उसे धकेलते और मुंह से इंजन की आवाज निकालते हुए हम लोग पूरा बरामदा घूमते रहते थे।मुझसे दो साल छोटी मेरी बहन मेरे खेल की.पहली साथी थी।हमारे मकान में सारे किराए दार ही थे लगभग आठ परिवार। अत: सहेलियां भी कम नहीं थी।बचपन की दोस्ती देर तक याद रहती है। रागिनी,दुर्गेश, गुड्डी न जाने कहां होंगी सब,हमारी कल्पना की दुनिया जिनसे आबाद रहती थी।कभी मां की साडी पहनकर न जाने कौन कौन से अनगढ, अनसुने गीतों पर हम थिरकते और नीचे वाली ललाइन चाची के ढोल पर संगीत के सारे बोलों की आजमाइश करते थे हम लोग।सबसे ज्यादा मजा तो.गुडिया की शादी पर आता ,जब एक जिम्मेदार मां बनकर हम उनका ब्याह रचाया करते थे। मेरी छोटी सायकिल को गुब्बारो से सजाकर ,कागज की रंगबिरंगी झंडियों से चंदोवा बनता और गुडडे राजा ठाठ से उस पर विराजते। मां अपनी सिलाई मशीन पर उसके लिए कपडे सिलती, मेरी पुरानी फ्राक से काट कर सलमा सितारे से दूलहे का मौर बनता ।और फिर बारात लेकर यह सवारी मेरी सहेली दुर्गेश के घर जाती थी।कोई डालडा के डिब्बों को बजाता तो कोई थाली या बच्चों वाली खंजडी ।बारात गाते बजाते पहुंच जाती। वहां भी बारातियों का शानदार स्वागत होता। गर्मी हो या उमस हम इन सबसे बेपरवाह बस अपने खेल में मस्त रहते थे।
अंतत; छुट्टियां बीत गयीं,जैसे कोई प्यारा सपना देखते हुए अचानक आंखें खुल जाती.हैं वैसी ही अनुभूति लेकर हम लौटते थे।लेकिन ढेर सारा आनंद, खुशी,उर्जा अपनी झोली में बाधकर।
आज भी बच्चों की छुटटिया होती हैं पर उम्र के इस पड़ाव पर वो बचपन की खुशियां लौटकर कभी नहीं आयीं।
- पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
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