लघुकथा :
साइलेंट
सुबह से रीमा का मन बेचैन था।
उसने बेटी को कॉल किया—
रिंग गई…
फिर कट गई।
कुछ देर बाद फिर कॉल—
इस बार सीधे कॉल रिजेक्ट।
तीसरी बार—
फोन साइलेंट पर चला गया।
रीमा का धैर्य टूट गया—
“इतनी भी क्या व्यस्तता… माँ का फोन तक नहीं उठाया जाता!”
वह गुस्से में बड़बड़ाने लगी।
तभी उसकी नज़र मोबाइल की कॉल हिस्ट्री पर पड़ी—
ऊपर ही ऊपर कल रात के मिस्ड कॉल चमक रहे थे—
“माँ”
उसे याद आया—
कल रात उसने फोन साइलेंट कर दिया था।
माँ बार-बार कॉल कर रहीं थी…
और उसने सोचा—
“अभी मेरा सीरियल चल रहा है, बाद में कर लूंगी।"
फिर मन नहीं किया यह सोच कर कि माँ के पास कहने सुनने को कुछ नया तो होता नहीं… और भूल गई।
सुबह उठकर भी उसने वापस कॉल नहीं किया। सोचा सारे काम निपटा कर, कर लूंगी। माँ को कौन सा कोई काम होता है ऐसे ही करती रहती है।
उसे समझ आ गया—
जो खामोशी हम अपने बड़ों को देते हैं,
वही खामोशी
एक दिन हमारे हिस्से भी आती है।
घुमंतू कहता हुआ आगे बढ़ गया -
“रिश्ते एक दिन में नहीं टूटते…
बस कॉल्स ‘साइलेंट’ होते-होते
दिल भी साइलेंट हो जाते हैं।”
- डॉ अंजना गर्ग , रोहतक
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