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काव्य : हमे युद्ध नहीं चाहिए - पद्मा मिश्रा, जमशेदपुर


 काव्य : 

हमे युद्ध नहीं चाहिए


धरती की सीमाओं के इस पार और उस पार भी,

वो कौन सी आग जलती है

जो जलाती है, संवेदनाओं के पल दर पल,

जली ,बिखरी दबी राख के नीचे

मानवता, करुणा की घुट्टी हुई चीखें,

क्यों सुनाई नहीं देती??

क्यों लज्जित हो जाती है,बुद्ध की करुणा,ईसा का त्याग

और विश्व शांति की भावनाएं??

बस शेष रहती है,केवल

दो व्यक्तियों की विकृत कामनाएं,

एक का अहम, दूसरे की चुनौती बन जाता है,

और इसके प्रतिकार में,

दमन भट्टियों में एक समूची मानवता को,

युद्ध की विभिषिका में, झोंक दिया जाता है,,

इतने विवश क्यों है हम? हम क्यों लड़ते हैं?

हम कब जागेंगे,,

जब विनाश की जहरीली हवा,

हमारे अस्तित्व को निगल जायेगी,

विज्ञान की कसौटियों पर गर्व करने वाले,

एक धमाके से, पूरी दुनिया को नष्ट करने वाले दावों पर

एक दिन दानवी चीत्कार गूंजेगी,

और पीढ़ियां हम पर गर्व नहीं, धिक्कार करेंगी,,

ये युद्ध नहीं चाहिए,

 नहीं चाहिए स्वार्थी वैचारिक संघर्ष,

रुको, ठहरों,चीख उठी है मानवता,

उसे जीने की आस दो,थोड़ी सी सांस दो,,,

बुझे हुए सपनों में जीवन की प्यास दो।


 - पद्मा मिश्रा, जमशेदपुर झारखंड

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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