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काव्य : खड़ा मदद को है अपनापन -उपमेंद्र सक्सेना , एडवोकेट,बरेली


 काव्य : 

खड़ा मदद को है अपनापन

गीत


भाया पपुआ की मौसी को 

अपना मित्तर गप्पी। 


किया नहीं जा सकता उसपर

पपुआ कहे भरोसा

छोड़ यहाँ वो पहले वाली 

तुझे रिझाता मौसा

काम न आई चाटुकारिता

व्यर्थ हुई पग-चप्पी। 


नेह निमंत्रण भेज रही थी

शोख़ अदा की रानी

कैसे ठुकरा पाती उसको

बीती हुई जवानी

दे दी पार अरब सागर के 

जादू वाली झप्पी। 


भाव  लगाते निष्ठाओं की

गंगा जी में  गोते

संवेदन के बीज मिलन के

नेक इरादे बोते

प्रेम -समर्पण बढ़ा रहे हैं

आपस की दिलचस्पी। 


घोल रही है खूब मधुरता

रिश्तों में मैलोडी

खड़ा मदद को है अपनापन 

मौके पर अब रेडी

अरमानों के सपनों को दी

अहसासों ने पप्पी। 


पुरस्कार नोबेल चाहिए

चले न इससे कुछ कम 

छप्पन इंची सीने मेंं है

झाड़मुड़ी का  दमखम

खेल रहे जो कुटिल कबड्डी

मिली हार में थप्पी।


- उपमेंद्र सक्सेना , एडवोकेट

'कुमुद- निवास', बरेली

मोबा.-98379 44187

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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