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दिमाग घुटनों में? : एक सोच का आईना -ऋचा चंद्राकर , महासमुंद


 

दिमाग घुटनों में? : एक सोच का आईना

     “लड़कियों का दिमाग घुटनों में होता है”—यह वाक्य सुनते ही प्रश्न उठता है कि इसे हल्का-फुल्का व्यंग मानें या नासमझी की पराकाष्ठा।

जब-जब यह बात मेरे सामने आती है, मैं सोचने को मजबूर हो जाती हूँ कि इतनी बेतुकी कल्पना आखिर जन्म कहाँ लेती है। क्या सच में किसी के शरीर का कोई अंग उसकी बुद्धि का स्थान तय करता है, या यह केवल एक ऐसी सोच है जो तर्क के अभाव में पल्लवित होती है?

यदि लड़कियों की बुद्धि पर प्रश्न उठाया जाता है, तो स्वाभाविक ही सवाल उठता है—ऐसी बातें कहने वाली सोच का स्तर क्या है? क्योंकि स्वस्थ और विवेकशील मन में इस प्रकार की तुच्छ धारणाएँ पनप ही नहीं सकतीं।

वास्तविकता यह है कि बुद्धि का कोई लिंग नहीं होता। यह न तो घुटनों में बसती है, न ही किसी विशेष वर्ग की संपत्ति है। यह तो शिक्षा, अनुभव और अवसरों से विकसित होती है।

आज महिलाएँ हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का प्रमाण दे रही हैं—विज्ञान, साहित्य, राजनीति, खेल—हर जगह। ऐसे में इस प्रकार के कथन केवल हँसी का विषय नहीं, बल्कि उस सोच का दर्पण हैं जो समय के साथ चलने से इंकार करती है।

आवश्यकता इस बात की है कि हम ऐसे वाक्यों पर हँसकर आगे न बढ़ जाएँ, बल्कि उन्हें चुनौती दें—ताकि आने वाली पीढ़ियाँ एक अधिक सम्मानजनक और समान सोच वाले समाज में साँस ले सकें।

 - ऋचा चंद्राकर , महासमुंद

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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