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काव्य : ओ! मुनिया के पापा - उपमेंद्र सक्सेना, एडवोकेट, बरेली


 काव्य : 

ओ! मुनिया के पापा

गीत


चले गए किस दुनिया में तुम

ओ ! मुनिया के पापा ? 


खामोशी घर के आँगन की 

बढ़ा रही बेचैनी

हिली नीव है अरमानों के

सपनों की पुश्तैनी

अहसासों ने गहन दर्द के

सागर को कब नापा ? 


आँख- मिचौली खेले आहट 

लगता है तुम आए

जादू वाली झप्पी  पाकर

अंग- पुष्प मुस्काए

खुली नींद जब विश्वासों की

सुध- बुध खोता आपा।


लगे आज जीवन के पथ में

चिंताओं के मेले

घातों पर आघात निरंतर

निष्ठाओं ने  झेले

अखबारों ने छिपा लिया सच

और झूठ फिर छापा। 


टूट गए हैं बच्चों के दिल 

हाय खिलौने- जैसे

लटक रहे हैं पेड़ों पर कब

उम्मीदों के पैसे

लगा दिया  किस्मत ने मुँह पर

लाचारी का थापा। 


मार गया खुशियों को लकवा

कहीं शरीकी हिस्सा

खतम किया है चालाकी ने

ऩ्याय पक्ष का किस्सा

काम न आया आदर्शो का 

मंत्र गया जो जापा।


--उपमेंद्र सक्सेना, एडवोकेट

 'कुमुद- निवास', बरेली (उत्तर प्रदेश)

 मोबा.-9837944187

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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