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व्यंग्य : समुद्र भैया और आपका एल नीनो - देवेंद्र कुमार रावत , भोपाल


व्यंग्य : 

समुद्र भैया और आपका एल नीनो: एक व्यंग्यात्मक संवाद
                                                           
   -  देवेंद्र कुमार रावत ,भोपाल

      समुद्र भैया, आखिर इतने गर्म क्यों हो रहे हो ? अभी तक तो हमने सिर्फ यही सुना था कि आप बहुत खारे हो, किंतु अब सुनने में आ रहा है कि आपके भाई, प्रशांत महासागर की सतह भी बेहद गर्म हो गई है । इसी कारण वे हमें अपनी लाल-पीली आँखें दिखा रहे हैं । वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन कहकर 'एल नीनो' का नाम दे रहे हैं, जिसका सीधा दुष्प्रभाव समुद्री सतह का तापमान बढ़ने से प्रशांत महासागर में दिखाई दे रहा है । वैज्ञानिकों का कहना है कि इस कारण कहीं भारी वर्षा होगी तो कहीं सूखा पड़ेगा । इससे भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के किसान तो चिंतित हैं ही, पर हमारे जैसे प्रेमियों के विषय में भी तो सोचो ! हमारा तो भविष्य ही खतरे में पड़ गया है । जब भरी बरसात में भी सूखा रहेगा, तो हम भला भीगते हुए 'भीगी-भीगी रातों में' जैसे फिल्मी गाने कैसे गाएँगे ? सावन-भादों के सूखे बीतने पर हमारे लिए इन गानों का क्या महत्व रह जाएगा- "मेरे नैना सावन भादों", या फिर- "सावन का महीना पवन करे शोर"। समुद्र भैया, माना कि सावन में शीतल-मंद पवन की जगह यदि धूलभरी आँधी चली, तो ऐसे डरावने मौसम में कोई कैसे झूमेगा ? ज़रा सोचो, तुम्हारी इन हरकतों से हमारी 'भीगी-भीगी रातें' कहीं 'सूखी-सूखी रातों' में तो नहीं बदल जाएँगी ? तुमने खुद तो गर्म होकर माहौल बिगाड़ा ही, साथ ही हमारे मानसून भैया को भी बहका दिया। अब वे 'टिप-टिप बरसा पानी' भी नहीं बरसाने वाले ।दूसरी तरफ, जहाँ तुम्हारी नाराजगी के कारण अतिवृष्टि (बाढ़) होगी, वहाँ हम पहाड़ी क्षेत्रों में मस्ती से यह गाना कैसे गाएँगे- "आज रपट जाएँ, तो हमें ना उठइयो"? इस गाने में तो अनुरोध किया गया है कि 'हमें मत उठाओ', लेकिन जब पहाड़ों पर पानी का सैलाब आएगा, तब किसकी हिम्मत होगी जो किसी को बचा सके ? पता नहीं यह मानसून भैया भी तुम्हारी बातों में कैसे आ जाता है और हर बार हमें धोखा दे जाता है ! जिस मानसून के लिए गाया जाता है- "उसके आने से आए बहार, उसके जाने से जाए बहार", भला उसका यह गाना हम कैसे सुन पाएँगे ? जब वर्षा न होने से वन-बाग ही सूख जाएँगे, तो बहार आएगी ही नहीं; और जब आएगी ही नहीं, तो उसके जाने का सवाल ही नहीं उठता।इसके अलावा, इस मौसम में महबूबा की मस्ती भी उतर जाएगी । भारी उमस के कारण उसका ब्यूटी पार्लर वाला महँगा मेकअप उतर जाएगा और उसकी सारी सुंदरता पसीने के साथ बह जाएगी । तब जो कड़वी असलियत सामने आएगी, उसका सामना न तो हमारी महबूबा कर पाएगी और न ही हमारी कल्पना ! हम तो जिसे हमेशा 'चंद्रमुखी' समझकर देखने को लालायित रहते थे, तुम्हारी इस अल्प-वर्षा के कारण वहाँ कोई और ही दृश्य उपस्थित हो जाएगा । इसके लिए सीधे तौर पर तुम ही जिम्मेदार माने जाओगे । समुद्र भैया, कुछ तो जवाब दो ! अपनी इन तूफानी लहरों के ज़रिए तुम हमें कब तक डराते रहोगे ? मेरी यह चुटीली बात सुनकर समुद्र से भी रहा नहीं गया। उसने गरजते हुए कहा- "यह सब होने से पहले क्या तुमने कभी मेरे बारे में भी सोचा था ? मेरी प्रेमी सरिताएँ यानी नदियाँ, जो मुझसे मिलने के लिए सदा आतुर रहती हैं, बेशक तुम्हारे शहरों और गाँवों से होकर ही आती हैं । पर तुमने उनका 'मेकअप' कितना बिगाड़ दिया है, यह देखा है ? कहाँ उनका उज्ज्वल गोरा तन था और कहाँ तुमने उन्हें हर प्रकार के प्रदूषण से कलुषित कर दिया ! अब जब वे मुझसे मिलती हैं, तो उन्हें देखकर मेरा मन भी उचाट हो जाता है । कई नदियाँ तो मेरा यह बदला हुआ मन जानकर, दूर से ही मुझे देखती हैं और पास आते-आते सूख जाती हैं । इसके विपरीत, पहले जब भी ये इठलाती-बलखाती नदियाँ मेरे पास आती थीं, तो मेरा मन मयूर नाच उठता था । पर अब तुमने प्रदूषण से उनका हाल ऐसा बेहाल कर दिया है कि वे समय से पहले ही वृद्ध लगने लगी हैं । तुमने तो अपनी हरकतों से नदियों का वह सदाबहार गाना भी बिगाड़ दिया, जिसमें गाया जाता था- 'ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में'। तुम्हारे कारण मेरी नदियाँ बेहाल हैं।असल में, तुम पहले जिन नदियों के प्रति श्रद्धा रखते थे, अब उन्हें महज एक भौतिक वस्तु की तरह इस्तेमाल करने लगे हो । मुझे तो इस बात पर भी आश्चर्य होता है कि इन प्रदूषित नदियों के किनारे तुम स्वयं को पवित्र करने कैसे चले आते हो ? तुम्हारे द्वारा फैलाया गया दोनों तटों पर हर पल जो कचरा इकट्ठा होता है, नदियों में वही सब बहकर मेरे पास आता है । तुम्हारी इन हरकतों के कारण वे मुझसे मिलने में शर्म महसूस करती हैं । वहीं मेरे अंदर रहने वाले जलचरों ने भी भारी नाराजगी जताई है, क्योंकि इन जलचरों की कई प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं या विलुप्त होने की कंगार पर हैं ।
                      इसलिए समय रहते सुधर जाओ, अभी तुम्हारे पास एक आखिरी मौका है । तुम्हें मालूम है कि त्रेतायुग में मैं उस समय आप लोगो की जीवनशैली से संतुष्ट था, तब महाकवि तुलसीदास ने भी मेरे बारे में लिखा है कि 'सागर निज मर्यादा रहहीं' अर्थात् वैश्विक तापमान के संतुलन के लिए हमेशा अपनी मर्यादा में रहता था । पर अब अपनी मर्यादा में रहना तुम भी सीखो, इसी में सबकी भलाई है ।"
                                                             
                                                           
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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