काव्य :
औरत के वजूद का सौदा
हर दौर में औरत के वजूद का सौदा होता आया है,
कभी रस्मों ने, कभी रिश्तों ने उसे बहुत आज़माया है।
अपने हिस्से की धूप समेट, सबको छाँव लुटाती रही,
फिर भी उसके दामन में दर्द ही दर्द समाया है।
अपने अरमानों की चिता पर न जाने कितनी बार जली,
तब जाकर कितने घरों की हर चौखट हँसकर खिली।
जिसने अपने आँचल से हर बिखरते रिश्ते को जोड़ दिया,
उसी की वफ़ाओं पर सबसे पहले उँगलियाँ उठीं।
वह मोम की तरह पिघलती रही, ताकि हर घर रोशन हो जाए,
अपने आँसू पीती रही, ताकि हर चेहरा गुलशन हो जाए।
जब रिश्तों का सच सामने आए, हर भ्रम भी रुख़्सत हो जाए,
उसकी हर वफ़ा को दगा कहना, कहीं आदत न हो जाए।
अजब दस्तूर है इस दुनिया का, यही हर बार हुआ है,
औरत ने सब कुछ खोया, फिर भी उसी को दोषी कहा है।
जिसने अपने वजूद से हर रिश्ते में साँसें भर दीं,
उसी के हिस्से हर इल्ज़ाम और हर फ़ैसला लिखा है।
वजूद का सौदा जब तक रिश्तों की शर्त बना रहेगा,
हर त्याग उसका फ़र्ज़ और हर आँसू नसीब रहेगा।
जिस दिन औरत का वजूद किसी सौदे में नहीं तौला जाएगा,
उसी दिन हर रिश्ता मोहब्बत से निभाया जाएगा।
- डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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