लघुकथा :
उत्तरदायित्व
सदियों पहले श्री मनसुख लाल जी अत्यंत अभावग्रस्त थे, संघर्ष के पलायन से वे पत्नी फुलिया बाई के साथ शुजालपुर छोड़कर भोपाल आ बसे थे। रेलवे स्टेशन पर दूध चाय बेचकर दो पुत्र और एक पुत्री को पाला, संघर्ष चलता रहा और स्वर्ग प्रस्थान कर गए।
पुत्रों ने धर्म को साथ रखकर संघर्ष का सामना किया दूध और चाय के साथ नाश्ता और मिठाई खुद हाथों से बनाया। हलवाई और कर्मचारी स्वयं बनकर शहर में और समाज में खुद को स्थापित किया। जीविका की इस जिजीविषा में कढ़ाई और कौंचे को भट्टी की सुर्ख आग में चलाते रहे। कोयला और राख समेटने में, उबलते तेल में खारे मस्ते समय अनगिनत बार हाथ जलाए किंतु उत्तरदायित्व कभी नहीं छोड़ा। दोनों की पत्नियों ने भी सुख छोड़कर सेवा में सहयोग किया। बड़ा बेटा 'श्री' धर्म को और छोटा 'हरि' कर्म को सहोदर भरोसे के साथ संयुक्त रूप से निभाते रहे।
कर्म और उत्तरदायित्व के श्रेष्ठ निर्वहन से यह परिवार शहर और समाज में प्रतिष्ठा पाने लगा।
कौन जानता था जिस परिवार ने भट्टी की सुर्ख आँच में कढ़ाई और कौंचे के घर्षण से श्रम के पसीने से स्वाद के कुन्दे बर्फी जमाई थी उस परिवार के बढ़ते हाथ कलम थाम सकेंगे। आज परिवार का बेटा दीप बनकर उसी जमीन पर शिक्षा विभाग में प्रकाशित हुआ है। उसे उत्तरदायित्व के बोध ने श्रीहरि कृपा से निहाल किया है, कलम के संघर्ष से 'मनसुख' पाया है और दादा का नाम सार्थक किया है। सच है परिवार और परंपरा भी जीवन के अनमोल उत्तरदायित्व हैं।
- संदीप नेमा 'दीप' ,भोपाल
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