साड़ी: महिलाओं की भावाभिव्यक्ति और हथकरघा संस्कृति का छह गज़ी कैनवास
- विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
भारत अपनी विविध संस्कृति, कला, खान-पान और परिधानों के लिए दुनिया भर में अनूठा है। इस संपूर्ण भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता को यदि किसी एक वस्त्र में समेटकर देखना हो, तो वह 'साड़ी' है। साड़ी केवल छह या नौ गज का कपड़ा नहीं है, यह भारतीय इतिहास, शिल्पकला और स्त्री के अंतर्मन की भावाभिव्यक्ति का जीवंत कैनवास है। यह भारत के ग्रामीण आर्थिक ढांचे की रीढ़ , अर्थात हथकरघा उद्योग का गौरवमयी प्रतीक भी है।
महिलाएं अपनी भावनाएं अपने पहनावे से भी व्यक्त करती हैं। यही कारण है कि आज के कॉर्पोरेट युग में, रोज़ाना जींस, सूट या फॉर्मल ब्लेज़र पहनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली आधुनिक लड़कियां भी जब किसी पूजा, उत्सव, ब्याह या सांस्कृतिक समारोह का हिस्सा बनती हैं, तो वे पूरे गर्व के साथ साड़ी में नज़र आती हैं।
क्योंकि आधुनिक नारी ने पैंट शर्ट भले पहन ली है, पर उसने बिछिया , पायल और मंगलसूत्र नहीं उतारा है। आज नारी दफ्तर के काम में जितनी सहज है, भारतीय मूल्यों के स्वागत में साड़ी की शालीनता में उतनी ही गौरवमयी और सम्मोहक भी है। साड़ी पहनना एक उत्सव है, अतीत का वर्तमान से संवाद और स्त्रीत्व का स्वयं से साक्षात्कार इस परिधान में है।
साड़ी का अस्तित्व भारत के लाखों बुनकरों के पसीने और कला से सुरक्षित है। इस पारंपरिक कला को बाज़ार और संबल देने में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और सरकारी एम्पोरियम्स की बड़ी भूमिका है। देश के प्रमुख शहरों भोपाल, इंदौर, कानपुर, चेन्नई, अहमदाबाद आदि में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला 'भारत स्थली' जैसा शो-रूम हो, या मध्य प्रदेश सरकार का पारंपरिक 'मृगनयनी' एम्पोरियम, ये केवल कपड़े बेचने की दुकानें नहीं हैं। ये भारतीय ताने-बाने के ऐसे जीवंत संग्रहालय हैं, जो सीधे बुनकर को शहरी खरीदार से जोड़ते हैं।
भोपाल का 'भारत स्थली' शो-रूम महिला सशक्तिकरण का अनूठा उदाहरण बन पड़ा है, जिसका प्रबंधन और संचालन पूर्णतया महिला स्टाफ द्वारा किया जाता है। साड़ियों की बारीकियों को समझना और पारंपरिक बुनकरों की कहानियों को आत्मीयता से ग्राहकों तक पहुंचाना, महिलाओं के इस हुनर को एक नया मंच देता है।
भारत के हर राज्य की आबो-हवा, मिट्टी और लोक-कथाएं वहाँ की साड़ियों के धागों में बुनी हुई मिलती हैं।
रानी अहिल्याबाई का नारी आत्मनिर्भरता का संकल्प , मध्य भारत में महेश्वर की साड़ियों के साथ स्त्री सशक्तिकरण का इतिहास जुड़ा है, जिसे रानी अहिल्याबाई होल्कर ने बुनकरों को संरक्षण देकर स्थापित किया था।
वहीं, गुना के पास की चंदेरी साड़ी अपनी रेशमी पारदर्शिता, हल्के वजन और बारीक ज़री के बूटों के लिए जानी जाती है।
वाराणसी के शुद्ध सिल्क पर सोने-चांदी के धागों से बुनी गई बनारसी साड़ी वैभव का प्रतीक है। आज भी हर भारतीय वधू की पहली चाहत बनारसी साड़ी ही होती है।
लखनऊ की महीन चिकनकारी कला सूती और जॉर्जेट पर सादगी और शालीनता बिखेरती है।
गुजरात के पाटन की बहुमूल्य पटोला (डबल इकत) के बारे में कहावत है कि इसका कपड़ा भले फट जाए, पर रंग और डिज़ाइन नहीं जाता।
मांगलिक अवसरों की शान बांधनी (टाई एंड डाई) के चटख रंग राजस्थान और गुजरात के हथकरघा का मुख्य आकर्षण हैं।
दक्षिण भारत में साड़ियों की रानी कही जाने वाली भारी सिल्क और मंदिर-डिज़ाइनों वाली कांजीवरम (तमिलनाडु), राजस्थान की हवा जैसी हल्की चौकोर खाट पैटर्न वाली कोटा डोरिया, पंजाब की जीवंत फुलकारी, बिहार की मधुबनी और देहरादून-कश्मीर के पहाड़ी मौसम के अनुकूल कलात्मक पश्मीना टच की साड़ियां भारत की भौगोलिक विविधता को दर्शाती हैं।
साड़ी पहनने की अनूठी क्षेत्रीय शैलियाँ रोचक हैं।
साड़ी की विशेषता सिर्फ उसकी बुनावट में नहीं, बल्कि उसे धारण करने की क्षेत्रीय तरीकों में भी छिपी है।
कुर्ग की कोडागु शैली (कर्नाटक) जहाँ साड़ी की प्लीट्स (सैल) आगे न आकर पीछे कमर पर आती हैं और पल्लू दाहिने कंधे पर बंधा होता है। यह शैली प्राचीन काल में महिलाओं को पहाड़ी रास्तों और कॉफी के बागानों में मुस्तैदी से काम करने की स्वतंत्रता देती थी।
महाराष्ट्र में नौवारी शैली से साड़ी पहनी जाती है । नौ गज की इस साड़ी को 'काष्टा' (धोतीनुमा) शैली में पहना जाता है। यह महिलाओं को घुड़सवारी और युद्ध कौशल के दिनों से गतिशीलता और शक्ति प्रदान करती आई है, जो आज भी लावणी नृत्य और गणेशोत्सव में उनके अदम्य साहस को दर्शाती है।
बंगाली (आतपोरे) और गुजराती (सीधा पल्लू) शैली, बंगाल की बिना प्लीट्स वाली और पल्लू पर चाबियों का गुच्छा लटकाने की अनूठी शैली हो या गुजरात का सीधा पल्लू, ये तरीके बताते हैं कि एक ही अनसिले कपड़े को कितने बहुआयामी रूपों में ढाला जा सकता है।
पर्यटन, उपहार परंपरा और सामाजिक ताना-बाना साड़ी का एक भावनात्मक रोचक आयाम है।
साड़ी सिर्फ स्वयं के उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का जरिया है। पर्यटन के दृष्टिकोण से देखें, तो पर्यटन क्षेत्रो में आने वाला हर सैलानी वहाँ की साड़ियों के प्रति सम्मोहित रहता है। वाराणसी की तंग गलियाँ हों, महेश्वर के घाट हों या दक्षिण के कांचीपुरम के मंदिर, इन पर्यटन स्थलों की यात्रा तब तक अधूरी रहती है जब तक वहाँ के स्थानीय बुनकरों की साड़ियाँ न खरीदी जाएं।
उपहार के रूप में साड़ी देने की परंपरा भारतीय संस्कारों की सुंदर कड़ी है। शादी में बेटी को दी जाने वाली विदाई की साड़ी हो, त्योहारों पर बहन-बेटी को भेजी जाने वाली 'बायना' या 'भेंट' हो, या सास द्वारा बहू को सौंपे जाने वाले खानदानी जेवरों के साथ रेशमी साड़ी, यह वस्त्र पीढ़ियों के बीच स्नेह, सम्मान और आशीर्वाद के हस्तांतरण का माध्यम बनता है।
हथकरघा उद्योग आज सिर्फ एक रोज़गार नहीं, बल्कि हमारी उस कलात्मक विरासत की सांसें हैं जो आधुनिक मशीनीकरण के दौर में अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। 'मृगनयनी' से लेकर 'भारत स्थली' जैसे मंचों के जरिए जब हम एक साड़ी खरीदते हैं, तो हम केवल एक परिधान नहीं खरीदते, बल्कि उस अदृश्य बुनकर के परिवार के सपनों को सींचते हैं। कुर्ग की उल्टी प्लीट्स से लेकर महाराष्ट्र की नौवारी तक और कॉरपोरेट की रश-ऑवर लाइफ से लेकर त्योहारों की रौनक में ,साड़ी समूचे अखंड भारत की सांस्कृतिक धरोहर और नारीत्व की शाश्वत गरिमा को एक खूबसूरत रेशमी धागे में पिरोए हुए है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
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