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न उठायें, आत्मघाती कदम,बचाएं अपनी धरा, पर्यावरण व गगन - इंजी. अरुण कुमार जैन ,फरीदाबाद


 

न उठायें, आत्मघाती कदम,बचाएं अपनी धरा, पर्यावरण व गगन

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इंजी. अरुण कुमार जैन 

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आज कल हम में से अधिकांश, नगरों की भीड़ भाड़ भरी आबादी से अलग, खुले स्थानों पर विकसित कवर्ड कैम्पसों में रहने लगे हैं. यहाँ वाहनों का शोर, गलियों की गंदगी, कुत्तों, सूअरों, सांडो का प्रकोप, भिखारी या वेंडरों का अतिक्रमण, कचरे के ढेर आदि घातक तथ्य नहीं हैं. कवर्ड कैंपस होने से बच्चों व महिलाओं को घूमने, साइकिल चलाने, खेलने की सुविधा है. परिसर साफ सुथरे हैं, चोरी - चमारी का भय नहीं है. CCTV कैमरे लगने से अपराध नियंत्रण में हैं व परिवार निश्चिन्त होकर कई  दिनों,महीनों बाहर जा सकते हैं.

इन परिसरों में एक ही स्तर के व्यक्तियों के रहने से आपसी मेलजोल भी अच्छा है. परिसर में क्लब, जिम, खेलकूद उपकरण, स्विमिंग पूल होने से घरेलू महिलाओं को भी अपने व्यक्तित्व विकास के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं व बच्चे मनवांछित क्षेत्र में प्रगति के पर्याप्त अवसर पा रहे हैं.

इन सबके बीच घर के अंदर व बाहर किचिन गार्डन,लॉन  व कालोनी के उद्यान में हम सभी सुन्दर मनोहारी फूल, बेल, पौधे, लताएं लगा रहे हैं. अधिक सम्पन्न व्यक्ति कोठीयों में हरियाली का अपनी इक्षानुसार विकास कर रहे हैं.

पर दिखावे के चक्कर में हम सभी एक बहुत बड़ा नुकसान कर आत्मघात कर रहे हैं. पहिले हमारे आस पास परंपरागत वृक्ष नीम, आम, शीशम, पीपल, बरगद, महुआ, हरसिंगार, कचनार, मौलश्री, अमरुद व औषधियों या फलों के वृक्ष हमारे घर के सामने या आँगन में होते थे. अधिकांश घरों के सामने नीम के बड़े बड़े वृक्ष होते थे आँगन में आम, अमरुद, मौसमी, अनार होते थे व मंदिर,खलिहान  व खेतों में शीशम, महुआ,अशोक,जामुन, पपीते, हरसिंगार, बेला, चमेली, रात रानी, मधुमालती के वृक्ष व लताएं थीं, जो शुद्ध हवा,शीतल छाया,फल, चारा, औषधि,वांछित लकड़ी, मनभावन सुगंध व मन की शांति देते थे.

   आज हम फेंसी ट्री, कांटेदार वृक्ष, पाम,बकान,कैक्टस, कनेर, क्रॉटन आदि अधिक संख्या में लगा रहे हैं, जो न तो छाँव दे रहे हैं, 

न फल, न औषधि, न वांछित स्तर की लकड़ी दे पा रहे हैं न बढ़ती गर्मी से सुरक्षा देने में सक्षम हैं.

आज देशभर में बड़े बड़े एक्सप्रेस वे बन रहे हैं पर वृक्षारोपण के नाम पर जहरीले कानोकार्पस, कनेर, बोगानबेलिया, गुलमोहर, बकान जैसे वृक्ष लगा रहे हैं जो न तो छाया देते हैं, न लकड़ी, न ही शीतलता प्रदान करने में सक्षम हैं. आज से 20-30 वर्ष पूर्व तक रोड के दोनों ओर नीम, शीशम, इमली, पीपल, बरगद, सागोन, महुआ के वृक्ष लगाए जाते थे जो छाया, शीतलता व सभी वांछित प्रदान करते थे. हजारों पक्षी इन पर रहते थे व आसपास के घने जंगलो में जंगली पशु अपने अभ्यारण में आनंद के साथ रहते थे.

   आज हमारी कालोनीयों में लगे वृक्षो की हर छह माह में ट्रिमिंग की जा रही है, फ्लस्वरुप 20-40 फ़ीट ऊँचे उठने वाले वृक्ष बोनसाई से बन 8-10 फ़ीट की ऊंचाई में सिमिट रहे हैं. जिनके नीचे छाया तक नहीं है, पक्षियों का बसेरा नहीं है, चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की मधुर तान, छोटे छोटे फुदकते चूजे, दौड़ती गिलहरियां भी दिखाई नहीं देतीं. ऊपर से हम अपने घरों में 16-18 डिग्री तापमान पर A C चलाकर अति गर्म हवा इन पर सारी रात फेंकते हैं, जिससे बचे खुचे पक्षियों को वेदना होती है.

   सबसे ज्यादा हानि हमें, हमारे परिवार, हमारे नगर व हमारी प्रकृति को है. पहिले हमें नीम, आम, बबूल की दातुन,  नीम,आम के पत्ते,विभिन्न तरह के फल, इन पर चढ़ती लताओं से फूल व सब्जियाँ, औषधियां मिलती थीं. तोरई, लौकी, कद्दू,पपीता, अमरुद, आम आदि बहुतायत में मिलते थे, आज सभी बाजार से खरीदने को अभिशप्त हैं क्योंकि बाजार के अधकांश उत्पादन जहरीले हैं.

घरों के सामने कांटे वाले कैक्टस, पाम, कनेर जैसे पेड़ या सिसकते कराहते आम, नीम, हरसिंगार बचे हैं. यह सभी हमारे अधूरे ज्ञान को दर्शाते ही हैं, इन सबसे हम अपनी वसुधा, संस्कृति व धरा के विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं.

हमारे धर्म ग्रंथो में सभी फल, फूल, औषधि के वृक्ष लगाने के आव्हान हमारे मनीषीयों ने किये हैं पर आज हम कवर्ड कैंपस में रहकर भी श्रेष्ठ हरियाली के विनाश को कर रहे हैं.

   धरा का तापमान 36 डिग्री से 48 डिग्री हो चुका है. जल स्रोत सूख रहे हैं. हर वर्ष गर्मी का मौसम गरीबों व गाँव वालों को अभिशाप बनकर आता है. ऑक्सीजन समाप्त हो रही है, हम मास्क व ऑक्सीजन सिलेंडर लगाकर जीने की ओर बढ़ रहे हैं.

  आइए आज से ही पहल करें.

अपने आवास परिसर के चारों ओर घने, ऊँचे वृक्ष लगावाएं, उनकी कटाई, छटाई बिलकुल बंद करें, टहनियों को लॉन, आँगन, छत तक आने दें, हवा के शीतल झोकों का आनंद पाएं. पक्षियों की चहचहाहट से संगीत सुनें. उनके घोंसलों में अंडो से छोटे छोटे पक्षी बनते प्यारे शिशुओं को देख आनंद लें, उनकी क्रीड़ा, माँ के अनुराग, समर्पण के साक्षी बनें.

सावन के महीने में इन पेड़ो की डालियों पर झूले बांधेजिन पर झूलकर हमारे बच्चे वर्षा की सुखद फुहार में झूलने का आनंद लें.

मौलश्री, हरसिंगार, पारिजात, रातरानी, मोगरा, चंपा लगाकर इनकी मोहक सुरभि अपने आस पास अनुभव करें.

  आपके इन प्रयासों से अपनी धरा का तापमान कम होगा, बिजली का बिल, मन की बैचैनी कम होगी.

पशुओं को चारा, हमें औषधि मिलेगी.

  निश्चित मानिये सूखे पत्ते या चिड़ियों की बीट आपको थोड़ी असुविधा देगी, पर मन भर पाकर तृनभर खोने जैसा होगा यह.

  हम अपने माता, पिता, दादा, दादी के जमाने के हरे भरे प्रांगण बनायें व शपथ लें कि हर जगह छायादार, फल, फूल, औषधि देने वाले वृक्ष लगाएंगे व भीषण गर्मी, सूखा व वेदना से धरा को मुक्ति दिलाएंगे.

"धरती माँ के आँचल में हम, नित्य हरितिमा लाएं,

फल, छाया, औषधि पाकर के,

नन्हे नीड़ बनायें.

कलरव का संगीत मधुर हो,

पवन हो शीतल, सुरभित,

 हर्ष, प्रेम, उल्लास विपुल हो, धरा बने यह अद्भुत.

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संपर्क //अमृता हॉस्पिटल, सेक्टर 88,फ़रीदाबाद, हरियाणा.

मो. 7999469175

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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