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लघुकथा : मेहमानों के लिए - डॉ अंजना गर्ग (सेवानिवृत), म द वि रोहतक


 

 लघुकथा : 

 मेहमानों के लिए 

    बबीता बाज़ार से काजू-बादाम और किशमिश लेकर आई। सामान अलमारी में रखते हुए उसने सहज भाव से कहा—

"माँ जी, ये डिब्बा यहीं रख देती हूँ।  इतवार को मेहमान आने वाले हैं, तब काम आएगा।"

 सासू माँ ने चुपचाप सिर हिला दिया।

उन्हें डॉक्टर की बात याद आई— "दवा के साथ थोड़ा सूखा मेवा लिया कीजिए।"

उस रात दवा लेते समय उनकी नज़र अलमारी पर गई। वे उठीं भी, लेकिन अगले ही क्षण वापस बैठ गईं।

मन में एक ही बात कौंधी—

"बहू ने तो मेहमानों के लिए रखा है..."

अगले दिन स्कूल से लौटते ही पोता मानव अलमारी खोलकर बैठ गया। उसने मुट्ठी भर काजू निकाले और  वहीं बैठ कर खाने लगा।

बबीता ने देखते ही कहा -

"खा ले बेटा, मेहमानों के लिए और आ जाएगा।"

माँ देर तक उस खुली अलमारी को देखती रहीं।

" फिर माँ ने आँखें मूँद लीं।

चुभन काजुओं की नहीं थी,

अपने ही घर में जन्मे उस संकोच की थी, जिसने उनके हाथ बढ़ने से पहले ही रोक लिए थे।"

 - डॉ अंजना गर्ग (सेवानिवृत)

   म द वि रोहतक

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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