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काव्य : पर्यावरण हुआ कितना प्रदूषित - मोनिका डागा “आनंद", चेन्नई


 काव्य : 

 पर्यावरण हुआ कितना प्रदूषित 


प्राकृतिक पर्यावरण हुआ कितना प्रदूषित,

मनुष्य करते प्रकृति से छेड़छाड़ अनुचित,

तीव्र तापमान से जल रहे धूॅं धूॅं कर जंगल,

कॉंटे जा रहे हैं मनमानी अंधाधुंध जंगल ।


मानव तो करता है वादों का ढकोसला,

कैसा विकास टूटा घरौंदा उजड़ा घोंसला,

असंखय जीव-जंतुओं को होती है हानि,

ऑंखों से झर-झर झरता दिन-रात पानी ।


कंक्रीटो का खड़ा किया है हर तरफ़ जाल,

बसेरा ढूॅंढते विकल पशु- पक्षी हुए बेहाल,

चारों तरफ भयानक शोर मन पर वीराना,

मिलें नहीं बहुत खोजने पर खाने को दाना ।


बंजर हुई भूमि उजड़ा प्रकृति का हरा श्रृंगार,

दुषित हुआ अन्न-जल हवा मचा है हाहाकार,

घुटता है दम धरा पर बोझिल हुई श्र्वासें सारी,

इंसानी महत्वाकांक्षाओं ने खड़ी की लाचारी ।


आज लगाएगा "आनंद" से कुछ हरे-भरे पेड़,

कल उनको एक झटके में देगा ये दुष्ट तोड़,

आज रील बनेगी जग से वाह-वाही मिलेगी,

और कल गुपचुप स्वार्थ की आरी चलेगी ।


-  मोनिका डागा “आनंद", चेन्नई 


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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