काव्य :
महाराणा प्रताप
था मातृभूमि पर सदा समर्पित ,
त्याग, तपस्या और बलिदान।
थी मंज़ूर घाँस की रोटी ।
पर नहीं डिगा था स्वाभिमान।।
उस वीर प्रतापी राणा,
का ।
करता है भारत गौरव गान।।
मेवाड़ के कुम्भल गढ़ में जब,
जन्मा था वीर प्रताप महान।
जयवंता बाई की गोदी में ,
पल- पल बढ़ता था स्वाभिमान।
वह शूर -वीर और महाप्रतापी,
जब चेतक पर चढ़ता था,
अरिदल सेना थर्रा जाती ,
जब हुंकार सिंह सी भरता था।।
भाला लेकर जब गरज- गरज,
वह सिंह सा आगे बढ़ता था।
अरि दल सेना का साहस तब,
तिनका -तिनका सा उड़ता था।।
जब काट -काट अरिदल सेना को,
हल्दी घाटी थी लाल करी।
उस वीर प्रतापी का शौर्य देख ,
थी अरिदल सेना डरी-डरी।।
राणा के संग- संग चेतक भी,
करता अरिदल पर वार पे वार।
हो गया था जब चेतक घायल,
तब किया राणा को नदिया पार।।
रण से राणा को किया दूर,
ऋण राणा का था चुका दिया।
स्वामी के प्राण बचाने को,
निज प्राणों का बलिदान किया।।
इतिहास में जब भी वीरों की,
गाथा को गाया जाएगा ।
राणा के संग चेतक का भी,
बलिदान सुनाया जाएगा।।
- सरोज लता सोनी , भोपाल
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